Tuesday, March 5, 2019

राजपुरुषों के लिए - 8

जब अपने बल अर्थात सेना को हर्ष और पुष्टियुक्त प्रसन्न भाव से जानें और शत्रु का बल अपने से विपरीत निर्बल हो जावे तब शत्रु की ओर युद्ध करने के लिए जावे।

जब सेना बल वाहन से क्षीण हो जाये तब शत्रुओं को धीरे धीरे प्रयत्न से शांत करता हुआ अपने स्थान में बैठा रहे।

जब राजा शत्रु को अत्यंत बलवान जाने तब द्विगुणा वा दो प्रकार की सेना करके अपना कार्य सिद्ध करे।

जब आप समझ लेवे कि अब शीघ्र शत्रुओं की चढ़ाई मुझ पर होगी तभी किसी धार्मिक बलवान राजा का शीघ्र आश्रय ले लेवे।

जो प्रजा और अपनी सेना और शत्रु के बल का निग्रह करे अर्थात रोके उस की सेवा सब यत्नों से गुरु के सदृश नित्य करे।

जिस का आश्रय लेवें उस पुरुष के कर्मों में दोष देखे तो वहां भी प्रकार युद्ध ही करे निःशंक होकर करे।

जो धार्मिक राजा हो उससे विरोध कभी न करे किन्तु उससे सदा मेल रखे और जो दुष्ट प्रबल हो उसी के जीतने के लिए ये पूर्वोक्त प्रयोग करना उचित है।

धर्म की परिभाषा : धर्म मानव की इन्द्रियों में सन्निहित रहता है इन्द्रियों से सही करने वाला धार्मिक और बुरा चलने वाला अधर्मी।  दूसरी परिभाषा के अनुसार किसी भी शुभ कर्म में कठिनता धर्म और सरलता अधर्म मानी जाती है।


इसका प्रथम खंड यहाँ पढ़ें - राजपुरुषों के लिए - ७

आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Monday, March 4, 2019

राजपुरुषों के लिए - 7

प्रधानमन्त्री, नेताओं, सैनिकों व अन्य सभी रक्षा विभाग के मंत्रियों, सुरक्षा कर्मियों, पुलिस, व अर्ध सैनिक बलों के लिए


सर्वप्रथम एक देश के नेता सुनें व इसी पर ही चले - (योग - अर्थात मिल कर रहें व चलें जब दुष्ट शत्रु से युद्ध की स्थिति हो)

मनुस्मृति (भगवान् वेद से निकाली गयी बातें)
(स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज के सत्यार्थ प्रकाश,  छठें  समुल्लास, राजधर्म विषय से )

जब राजादि राजपुरुषों को यह बात लक्ष्य में रखने योग्य है जो (आसन ) स्थिरता, (यान) शत्रु से लड़ने के लिए जाना (सन्धि ) उन से मेल कर लेना, (विग्रह) दुष्ट शत्रुओं से लड़ाई करना (द्वैती भाव) दो प्रकार की सेना करके स्व विजय कर लेना (संश्रय) और निर्बलता में दूसरे प्रबल राजा (देश) का आश्रय लेना ये छः प्रकार के कर्म यथायोग्य कार्य को विचार कर उसमें युक्त करना चाहिए। १।

राजा(प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री, सेना अध्यक्ष) जो संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैतीभाव और संश्रय दो-दो प्रकार के होते हैं उनको यथावत जाने। २।

(संधि) शत्रु से मेल अथवा उससे विपरीतता करे परन्तु वर्तमान में करने के काम बराबर करता जाय यह दो प्रकार का मेल कहाता है। ३।

(विग्रह) कार्य सिद्धि के लिए उचित व अनुचित समय में स्वयं किया व मित्र के अपराध करने वाले शत्रु के साथ विरोध दो प्रकार से करना चाहिए। ४।

(यान) अकस्मात् कोई कार्य प्राप्त होने में एकाकी वा मित्र के साथ मिल के शत्रु की और जाना यह दो प्रकार का गमन कहाता है। ५।

स्वयं किसी क्रम से क्षीण हो जाए अर्थात निर्बल हो जाय अथवा मित्र के रोकने से अपने स्थान में बैठ रहना यह दो प्रकार का आसन कहलाता है। ६।

कार्य सिद्धि के लिए सेनापति (सेनाध्यक्ष ) और सेना के दो विभाग करके विजय करना दो प्रकार का द्वैध है। ७।

एक किसी अर्थ की सिद्धि के लिए किसी बलवान राजा वा किसी महात्मा (महापुरुष) की शरण लेना जिससे शत्रु से पीड़ित न हो दो प्रकार का आश्रय लेना कहलाता है। ८।

जब यह जान लो कि इस समय युद्ध करने से थोड़ी पीड़ा प्राप्त होगी और पश्चात करने से अपनी वृद्धि और विजय अवश्य होगा तब शत्रु से मेल कर के उचित समय तक धीरज रखो। ९।

जब अपनी सब प्रजा वा सेना अत्यंत प्रसन्न उन्नतिशील और श्रेष्ठ जाने, वैसे अपने को भी समझे तभी शत्रु से विग्रह (युद्ध) कर लेवे। १०।


नोट - छः बातें और हैं इस टॉपिक परपढ़ें - राजपुरुषों के लिए - 7 

आपका ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा आर्य

एयर स्ट्राइक के गुल्ले

शहीद कराओगे कितने मोदी ३०० सीट की खातिर
पूछे केजरीवाल तुम्हीं से पाकिस्तानी है शातिर
गुल्ले में गुल्ला है ये पाकी मुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

कितने बम गिराए कितने ढेर कराये तुमने
पूछूँ मैं सबूत दिलाओ मैं नहीं मानूं क्यूने
ममता भी गुल्ला है ये पाकी गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

अखिलेश वेश में चले देश में करो जाँच दोबारा
पुलवामा में हमला हुआ कैसे भाई ये सारा
नापाक में ताली सेना को गाली दिला रहा है गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

सैटेलाइट पर पिक्चर देखो करो प्रमाणित घटना
एयर स्ट्राइक पर शक है मुझको ये ही मुझको रटना
मोदी झूंठा इमरान है प्यारा सच्चा सुन्दर गुल्ला
भाई रे दिग्गी गुल्ला है जी गुल्ला।

माया जाल बिछाए और जादू काला फैलता जाए
छिपा रहे हो अपनी हारें ये ये घटना कहती जाएँ
ग़ुल्लों में माया है जी गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये तो गुल्ला।

ध्यान भटकाया दम अटकाया मोदी जी ने सबका
सोच समझ कर महबूबा को कम अँकवाया कबका
मुफ़्ती है मुफ्त में छाया गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

नई जोत है नई शान है डायलॉग की भाई
कोई धर्म न कोई देश न आतंकी का भाई
सिद्धू को पी एम - पी ओ के ने खिला दिया रसगुल्ला
भाई रे ये भी गुल्ला है ये गुल्ला।

फारुख आन है फारुख शान है इमरान की पीठ थपथपाई
शांतिदूत को देकर बधाई मोदी को दी जंग ख़त्म की दुहाई
गुल्ले में सब से बड़ा पुछल्ला
भाई रे फारुख गुल्ला है ये गुल्ला।

मानो मोदी पी चित अम्बर अम  और टी गुल्ले की
तनाव ख़त्म हो नीति ऐसी ही अपनाना भाई
भाई ग़ुल्लों में है सस्ता गुल्ला
भाई ये गुल्ला है जी गुल्ला।

अम्मार बोलता स्ट्राइक एयर से साँस फट गयी भाई
विदेश मंत्री की साँस रुक गयी जन्नत में हुई रुसवाई
माने दहशतगर्द पाक के सारे मुल्ला
भाई रे विपक्षी गुल्ला हैं जी गुल्ला

सेना का पराक्रम सरकार का शौर्य कुछ भी नहीं है भाया
नापाक को ताली सेना को गाली दिलाता महामिलावट गुल्ला
रसगुल्ला नहीं ये तो गुल्ला है जी गुल्ला

स्वरचित
ब्र० अनुभव शर्मा आर्य





Friday, March 1, 2019

राजपुरुषों के लिए - 6

برباد  گلستان کرنے کو جب ایک ہی الو  کافی تھا
انجام گلستان کیا ہوگا ہر شاخ پی الو بیٹھا ہے

बर्बाद ए गुलिस्तां करने को जब एक ही उल्लू काफी था।
अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा हर शाख़ पे उल्लू बैठा है।

अब पाकिस्तान से हम चाहते हैं कि दहशत गर्दी को मिटा दें परन्तु जब तक दहशतगर्दी के नुमाइंदे और दहतगर्दों को शरण देने वाले भारत में बैठे हैं हम सिर्फ दूसरे देश को कहते अच्छे नहीं लगते।  इसलिए दहशतगर्दी के मुख्य इलाक़े कश्मीर और भारत में फैले इन उल्लुओं को वश में करने के जो क़दम सरकार आज उठा रही है वो क़ाबिल ए तारीफ़ है। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारा मनुस्मृति से छांटे गए कुछ नियम जो सरकार और सेना व सैनिकों के काम आ सकते हैं मैं लिख रहा हूँ।  हालांकि यदि आप को उपलब्ध हो पाए तो स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास का मुताल्ला फरमाएं जो कि राज धर्म विषय पर आधारित है -

१- कदापि किसी के साथ छल से न वर्तें किन्तु निष्कपट होकर सब से वर्त्ताव रखें और नित्य प्रति अपनी रक्षा करके शत्रु के किये हुए छल को जान के निवृत्त (समाप्त) करें। 

२- कोई शत्रु अपने छिद्र अर्थात निर्बलता को न जान सके और शत्रु के छिद्रों को जानता रहे जैसे कछुआ अपने अंगों को गुप्त रखता है वैसे शत्रु के प्रवेश करने के छिद्र को गुप्त रखे अर्थात जग जाहिर न करे ताकि कहीं शत्रु अलर्ट न हो जाये। 

३- जिस व्यक्ति की कार्य करने की नीतियों का भेद पहले ही फूट जाता है उसका कार्य कभी भी पूर्ण होना संभव नहीं।  अर्थात कार्य करने की विधियों व अन्य सूचनाओं को अति गुप्त रखना चाहिए ताकि अपने उद्देश्य में पूर्ण हो सकें।  कार्य पूर्ण हो जाने के बाद उन नियमों व सूचनाओं को जग ज़ाहिर करना ठीक नीति है। 

४- जैसे बगुला ध्यानावस्थित होकर मच्छी पकड़ने को ताकता है वैसे अर्थ संग्रह का विचार किया करे, द्रव्यादि पदार्थ और बल वृद्धि कर शत्रु को जीतने के लिए सिंह के सामान पराक्रम करे।  चीता के समान छिप कर शत्रुओं को पकडे और समीप आये बलवान शत्रुओं से खरगोश के समान दूर भाग जाये और पश्चात उनको छल से पकडे। 

 ५-इस प्रकार विजय करने वाले सभापति के राज्य में जो परिपन्थी अर्थात डाकू लुटेरे हों उनको (साम) मिला लेना (दाम) कुछ देकर (भेद) फोड़ तोड़ करके वश में करे।  और जो वश में न हों तो अतिकठिन दंड से वश में करे। 


आपका ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Thursday, February 28, 2019

राजपुरुषों के लिए - 5

जब कभी प्रजा का पालन करने वाले राजा को कोई अपने से छोटा, तुल्य और उत्तम संग्राम में आव्हान करे तो क्षत्रियों के धर्म का स्मरण करके संग्राम में जाने से कभी निवृत्त न हों अर्थात बड़ी चतुराई के साथ उनसे युद्ध करे जिससे अपना ही विजय हो। 

जो संग्रामों में एक दूसरे को हनन करने की इच्छा करते हुए राजा लोग जितना अपना सामर्थ्य हो बिना डर पीठ न दिखा युद्ध करते हैं वे सुख को प्राप्त होते हैं।  इससे विमुख कभी न हों।  किन्तु कभी कभी शत्रु को जीतने के लिए उनके सामने से छिप जाना उचित है।  क्यूंकि जिस प्रकार से शत्रु को जीत सकें वैसे काम करें।  जैसा सिंह क्रोध में सामने आकर शस्त्राग्नि में भस्म हो जाता है वैसे मूर्खता से नष्ट भ्रष्ट न हो जावें।  

युद्ध समय में न इधर उधर खड़े हुए, न नपुंसक, न हाथ जोड़े हुए, न जिस के सिर के बाल खुल गए हों, न बैठे हुए को, न "मैं तेरी शरण हूँ" ऐसे कहने वाले को, 

न सोते हुए को, न मूर्छा को प्राप्त हुए, न नग्न हुए, न शस्त्र से रहित, न युद्ध को देखने वाले को, न शत्रु के साथी को। 

न आयुध के प्रहार से पीड़ा को प्राप्त हुए को, न दुखी, न अत्यंत घायल, न डरे हुए, और न पलायन करते हुए पुरुष को, न सत्पुरुष के धर्म का स्मरण करते हुए को, योद्धा लोग कभी न मारें बल्कि पकड़ कर बंदीगृह में रख दें और भोजन छादन यथावत देवें।  और जो घायल हुए हों उन्हें औषधादि, भोजन छादन यथावत देवें।  न उनको चिढ़ावें न दुःख देवें।  जो उनके योग्य काम हो करवावें।  विशेष इस पर ध्यान रखें कि स्त्री, बालक, वृद्ध और आतुर तथा शोकातुर पुरुषों पर अस्त्र न चलावें।  उनके लड़के बालों को यथावत पालें और स्त्रियों को भी पालें।  उन को अपनी माँ , बहन और कन्या के तुल्य के समान समझे।  कभी विषयासक्ति की दृष्टि से भी ना देखें।  जब राज्य अच्छे प्रकार जम जाय और जिन में पुनः पुनः युद्ध करने की शंका न हो उनको सत्कारपूर्वक छोड़ कर अपने अपने घर व देश को भेज देवें। और जिन से भविष्यत् काल में विघ्न होना संभव हो उनको सदा कारागार में रखें। 


मनुस्मृति , सत्यार्थ प्रकाश - राजधर्म विषय - समुल्लास ६ से
द्वारा ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Wednesday, February 27, 2019

यू एन ओ क्या है?

UNO  क्या और क्यों / 
क्या पी० एम०  की विदेश यात्रायें ज़रूरी थीं ?
 आम तौर पर आम जनता जानती नहीं कि यू० एन०  क्या है व कोई भी बात यू एन ओ में रखने से क्या लाभ किसी देश को पहुँचता है? ग्रामीण व कम पढ़े लिखे लोग यू० एन०  का मतलब यू० एस० ए०  अर्थात अमेरिका से लेते हैं और सोचते हैं कि मात्र अमेरिका या और किसी देश से किसी बात को कहने से क्या लाभ है।  उन्हें मेरे भाइयों बहनों को इस लेख को अवश्य ही पढ़ना चाहिए। 

वास्तव में यू० एन० एक ऐसी संस्था है कि जिसमें १९२ सदस्य होते हैं।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर क़ानून व्यवस्था, शांति व्यवस्था व अन्य  मुद्दे यह बनाती, तय करती व संशोधित करती है।  UNSC इसी की एक ऐसी संस्था है जो कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा के कार्यों को देखती है।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार कानून व अन्य अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को बनाना व संशोधित करना इसका मुख्य कार्य है। जिस प्रकार जिला कोर्ट के ऊपर हाई कोर्ट और उससे ऊपर सुप्रीम कोर्ट होता है।  व सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने देश में मानना अनिवार्य है, जिस प्रकार संसद में बने नियम सभी को मानने आवश्यक होते है इसी प्रकार यह संस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है और इसमें बने क़ानून व नियम सभी देशों को मानने अनिवार्य हैं।  यह अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् है जिसमें कुल १५ सदस्य होते हैं।  जिसमें कि पाँच सदस्य स्थायी होते हैं जिनको वीटो पावर के नाम से भी जाना जाता है। पांच वीटो पावर हैं - चीन, रूस, अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन एवं फ्रांस।  दस अस्थाई सदस्य होते हैं और ये अस्थायी सदस्य १९२ सदस्यों में से वोट के आधार पर दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं।  

अब भाइयों बहनों यदि भारत के अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध बनते हैं तो भारत भी UNSC  का सदस्य बन सकता है जिससे कि अंतर्राष्ट्रीय कानून व्यवस्था में इसका भी दखल हो जायेगा।  जिससे कि अपनी आवश्यकता के क़ानून भारत UNSC में पास करवा सकता है। वीटो पावर किसी भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारित होने वाले प्रस्ताव पर 'नो' लिखने का अधिकार रखती है। यदि पांच में से किसी भी वीटो पावर प्राप्त देश ने 'नहीं' लिख दिया तो वह प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। यहीं चीन भारत के खिलाफ करता चला आया है अभी तक पकिस्तान के मामले में।  जिसके कारण पकिस्तान अभी तक आतंकी देश घोषित नहीं हो पाया अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर। 

यह पोस्ट गाँव में रहने मेरे उन भाई बहनों को समर्पित है जो कि इस विषय में कुछ भी नहीं जानते और प्रश्न करते हैं कि जब देश को ज़रूरत थी तो मोदी जी बाहर के देशों की यात्रा कर रहे थे। भाईयों बहनों यह यात्रा मात्र नहीं थी अन्य जो सरकारें आयीं वह इस काम को बिलकुल न कर पायीं और न ही उन लोगों की अंतर्राष्ट्रीय यात्रायें इतनी सफल हो पाती थीं।  राहुल गाँधी ने भी संसद में माना है कि मोदी बहुत पावरफुल व्यक्ति हैं।  विदेश में जाना और उन लोगों को अपने पक्ष में करना कोई आसान काम नहीं।  उस में पद और फिर व्यक्तित्व दोनों ही आवश्यक होते हैं  जो मोदी जी ने कर दिखाया। अभी पुलवामा वाली दुखद घटना को केवल १४ दिन हुए हैं और पकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद अर्थात जेहाद के मुद्दे पर सभी देश भारत के साथ खड़े हैं  और चीन भी भारत के विपक्ष में नहीं।  यह सब माननीय प्रधानमंत्री आदरणीय श्री नरेन्द्र मोदी जी के अथक प्रयासों के कारण ही है। 

और विस्तार से जानने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें/ लिंक कॉपी और पेस्ट करें और विस्तार से जानें -



UN (यू० एन० ) -https://en.wikipedia.org/wiki/United_Nations
UNSC(यू०एन०एस०सी०) - https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_members_of_the_United_Nations_Security_Council


आपका ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Tuesday, February 26, 2019

राजपुरुषों के लिए - 4

ॐ जब सभेश राजा इन्द्र अर्थात विद्युत् की तरह शीघ्र ऐश्वर्य का कर्ता, वायु के समान सब के प्राणवत प्रिय  और ह्रदय की बात जानने वाला, यम पक्षपातरहित न्यायधीश के समान वर्त्तनेवाला , सूर्य के समान न्याय, धर्म, विद्या का प्रकाशक अन्धकार अर्थात अविद्या अन्याय का निरोधक, अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करनेवाला, वरुण अर्थात बांधनेवाले के सदृश दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला, चंद्र के समान श्रेष्ठ पुरुषों को आनंद दाता , धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति (प्रधान मंत्री) होवे। 

जो सूर्य के समान प्रतापी सब के बाहर और भीतर मनों को अपने तेज से तपानेवाला, जिसको पृथ्वी में करड़ी दृष्टि से देखने को कोई भी समर्थ न होवे।  

और जो अपने प्रभाव से अग्नि, वायु, सूर्य, सोम, धर्म प्रकाशक (धर्म मानव की इन्द्रियों में समाहित है जैसे सुदृष्टि धर्म, कुदृष्टि अधर्म, सुकर्म धर्म, कुकर्म अधर्म, अच्छा बोलना धर्म, बुरा बोलना अधर्म, सच बोलना धर्म, झूठ बोलना अधर्म आदि आदि ) धनवर्धक, दुष्टों का बन्धनकर्ता, बड़े ऐश्वर्यवाला होवे, वही सभाध्यक्ष सभेश होने के योग्य होवे। 

जो दंड है वही पुरुष राजा, वही न्याय का प्रचार कर्ता और सब का शासन कर्ता, वहीँ चार वर्ण और आश्रमों के धर्म का प्रतिभू अर्थात जामिन है। 

वहीँ प्रजा का शासनकर्ता, सब प्रजा का रक्षक, सोते हुए प्रजास्थ मनुष्यों में जागता है इसीलिये बुद्धिमान लोग दंड को ही धर्म समझते हैं। 
 ॐ 

ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Monday, February 25, 2019

एक कविता : दशहतगर्दी के खिलाफ

आतंकवाद के खिलाफ एक कविता 


सुन लो दहशत गर्दों सुन लो आ गयी तुम्हारी बारी है।
पी ओ के से कश्मीर तलक अब जंग हमारी जारी है।



अभी तो ये आगाज़ हुआ है अभी से क्यों घबराते हो।
वन्दे मातरम के नारों से जब तुम यूँ थर्राते हो।

कैसे करोगे सेना का तुम मुक़ाबला ऐ जान ए जां।
जाने मन तुम दहशत गर्दी पर अब क्यों पछताते हो।

सुखोई और मीराज तलक अब लगे ठिकाने दुश्मन पर।
४५ के बदले ४५० गिराकर उतरे जब वापस अपने अड्डे पर।
 
मान जाओ ना जनाब ए आली अब चूं चं न करना तुम।
मंगलवार को मंगल-वार सुन अब चुप हो के पड़ना तुम।

जय बजरंग बली।  भारत माता की जय।  वन्दे मातरम।  जय जय भारतीय सेना।

यूट्यूब पर सुनें - आतंकवाद के खिलाफ एक कविता 

ब्र० अनुभव शर्मा

Sunday, February 24, 2019

राजपुरुषों व सैनिकों के लिए -३

हमारे वीर सैनिकों के लिए यह कलेक्शन है।


गीता।२।२३
१. नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।१

ऋग्वेद से -
२. शं  नः कुरु प्रजाभ्य: अभयं नः पशुभ्यः।२

अथर्ववेद ।१९।१५।५
३. ओ३म् अभयंन: करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावा पृथिवी उभे इमे। अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु।३

अथर्ववेद ।१९।१५।६।
४. ओ३म् अभयं मित्राद भयम् मित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात्।
अभयं नक्तमभयं दिवा न: सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु।४

५. न मे भक्तः प्रणश्यति। महावाक्य, गीता।

६. सन्देहात्मा विनश्यति।महावाक्य, गीता। 




अर्थ : 

1. न अग्नि इसे जला सकती न शस्त्र इसे बेध सकते वह अजर अमर आत्मा हैं हम। सो कर्तव्य में डंट जा। परमात्मा सदा अदृश्य रूप में हमारे साथ है। और वह नहीं है ऐसा नहीं है, वह है। यह वेद के द्वारा परमात्मा खुद कहते हैं।

2. हे प्रभु मुझे शत्रु से पूर्ण निर्भय कर।

3. मेरे प्रभु अंतर्यामी सब विधि अभय प्रदान करें।
अंतरिक्ष द्यावा पृथ्वी सब दिशा भय का नाश करें।

4. मित्र अमित्र जाने अनजाने, दिन रात अभय बनावें।
सभी दिशाएं मित्र बनें जीवन में निर्भयता लावें।

५. मेरा भक्त कभी दुर्गति या विनाश को प्राप्त नहीं होता।

६. जो लोग परमात्मा, सदगुरु , विद्वान्, ऋषि मुनि, वैज्ञानिकों व अपने माता पिता के वचनों पर संदेह करते हैं वो शीघ्र ही विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।



ब्रह्मचारी अनुभव आर्य

राजपुरुषों के लिए-2

राजपुरुष सभापति (प्रधानमन्त्री) कैसा हो?

परमात्मा कहते हैं कि -

हे मनुष्यों! जो इस मनुष्य के समुदाय में परम ऐश्वर्य का कर्ता शत्रुओं को जीत सके, जो शत्रुओं से पराजित न हो, राजाओं(Leaders) में सर्वोपरि विराजमान, प्रकाशमान हो, सभापति (प्रधानमन्त्री) होने को अत्यंत योग्य, प्रशंसनीय गुण, कर्म, स्वभावयुक्त, सत्करणीय, समीप जाने और शरण लेने योग्य, सब का माननीय होवे उसी को सभापति राजा(Ruler) करें।  अथर्व० ६-१०-१८-१

हे विद्वानों राजप्रजाजनों तुम इस प्रकार के पुरुष को बड़े चक्रवर्ती राज्य, सबसे बड़े होने, बड़े-बड़े विद्वानों से युक्त राज्य पालने और परम ऐश्वर्ययुक्त राज्य और धन के पालन के लिए सम्मति करके सर्वत्र पक्षपात रहित पूर्ण विद्या विनययुक्त, सब के मित्र सभापति राजा को सर्वाधीश मान के सब भूगोल शत्रु रहित करो। यजु० ९-४०

ईश्वर उपदेश करता है हे राजपुरुषों तुम्हारे आग्नेयादि अस्त्र और शतघ्नी(तोप ) भुशुण्डी (बन्दूक ) धनुष बाण करवाल (तलवार) आदि शस्त्र शत्रुओं के पराजय करने और रोकने के लिए प्रशंसित  हों और तुम्हारी सेना प्रशंसनीय होवे कि जिससे तुम सदा विजयी होवे परन्तु जो निन्दित अन्याय रूप काम करता है उसके लिए पूर्व चीज़ें मत होवें अर्थात जब तक मनुष्य धार्मिक रहते हैं तभी तक राज्य बढ़ता रहता है और  दुष्टाचारी होते हैं तब नष्ट भ्रष्ट हो जाता है। ऋग० १-३९-२ 

Saturday, February 23, 2019

राजपुरुषों के लिए-1

🕉🇮🇳जैसा परम विद्वान अध्यापक गुरु होता है वैसा विद्वान सुशिक्षित होकर Ruler व सैनिक को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा यथावत करे - मनु०

ईश्वर उपदेश करता है कि राजा व प्रजा के पुरुष(Leaders, soldiers and civilians) मिल कर सुख प्राप्ति और विज्ञान वृद्धि कारक राजा प्रजा के संबंध रूप व्यवहार में तीन सभा नियत करके बहुत प्रकार के समग्र प्रजा(all people) संबंधी मनुष्यादि प्राणियों को सब ओर से विद्या, स्वातंत्रय, धर्म(धर्म मानव की इंद्रियों में सन्निहित रहता है) सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें।
ऋग०। 3।38।6।

Tuesday, January 22, 2019

आत्मा को अपनी ऐसे सजा


भाइयों बहनों अगर आपको सच्चा मनुष्य बनना है तो ईश्वर ने वेद में बताया है -
 

जीवन को अपने ऐसे सजा जिससे उजाला पूर्ण हो।
मन को तू अपने ऐसे सजा जिससे मधुरता पूर्ण हो ।
तन को तू अपने ऐसे सजा जिससे भरा बल पूर्ण हों ।
बुद्धि को अपनी ऐसे सजा जो ज्ञान से भरपूर हो ।
इन्द्रियों को अपनी ऐसे सजा  जिससे सदा दुःख दूर हो।
प्राणों को अपने ऐसे सजा मृत्यु भी  जिससे दूर हो।
सत्यानंद योगाभ्यास से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
सत्यानंद सत्य से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
सत्यानंद ओ३म् से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
आत्मा को अपनी ऐसे सजा जिससे तुम्हारा मोक्ष हो॥

और ये तभी हो सकता है-

श्वांस श्वांस पर ॐ भज वृथा श्वांस मत खोवे। 
न जाने ये स्वांस भी आये या ना आवन होवे।
परमात्मा हर जगह मौजूद है पर नजर आता नहीं।
योग साधन के बिना कोई उसे पाता नहीं।
रात के चौथे प्रहरों में एक दौलत लुटती रहती है।
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है सो खोवत है।
उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन  कहाँ जो सोवत है।
प्रभु जागत है तू सोवत है।



आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Monday, December 24, 2018

इतिहास की परीक्षा : हास्य कविता

इतिहास की परीक्षा  थी उस दिन, चिंता से ह्रदय धड़कता था।
थे बुरे शगुन घर से चलते ही, बांया हाथ फडकता था।

मैंने सवाल जो याद किये, वो केवल आधे याद हुए।
उनमें से भी कुछ स्कूल तलक, आते आते बर्बाद हुए।

परचा हाथों में पकड़ लिया, ऑंखें मूंदीं टुक झूम गया।
पढ़ते ही छाया अन्धकार, चक्कर आया सर घूम गया।

ओ प्रश्न पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम।

तू लिख दे तेरी जो मर्जी है,ये परचा है या एटम बम।

गीता कहती है कर्म करो, फल की चिंता मत किया करो।
मन में आये जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो।

मेरे अंतर के पट खुले, पर्चे पर कलम चली चंचल।
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल।

मैंने लिखा पानीपत का, दूसरा युद्ध था सावन में, 
जापान जर्मनी के बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में। 

लिख दिया महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी जी के चेले थे। 
गांधी जी के संग बचपन में, वे आँख मिचोली खेले थे। 

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था,
अकबर ने हिन्द महासागर, अमरीका से मंगवाया था। 

महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था,
औरंगजेब रंग में आकर, औरों की जेब काटता था। 

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे,
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे मेँ लिख मारे।

जो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख,
बोला इन सब छात्रों में, बस होनहार है यहीं एक।

औरों के पर्चे फ़ेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए,
जीरो नंबर देकर बाकी के, सारे नम्बर काट लिए।


कवि - ॐ प्रकाश आदित्य

संकलन - ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Wednesday, June 20, 2018

हिन्दू धर्म अपनाना

मन से मोह विचार कर
रख कर्त्तव्य का ध्यान
योगारूढ़ मस्तिष्क से कर
सामाजिक रीतियों का ज्ञान
कहता हूँ मन की अपने मैं
ना जानूँ वेद पुरान
पर सत्य लिखूँ और सत्य वचन
ही है मेरी बिलकुल बस पहचान।

शाकाहार से तृप्त हो
कर निर्गुण का ध्यान
पुरुषारथ परमारथ व ज्ञान कर
पुस्तक उपनिषद और वेद से
पाले आध्यात्मिक विद्या का भान
तू करले धर्म को प्यार अरे
करवाता हूँ मैं भान
गर नियम यहीं अपनाएगा
करेगा गहन विज्ञान का पान
हो जाएगा मृत्यु विजय तू
यह सत्य वचन कर ध्यान।

गर मांसाहार अपनाएगा
नहीं कभी कर पायेगा जीवन में
आध्यात्मिक विज्ञान का ज्ञान
यह विज्ञान है श्रेष्ठ 25 गुण
साधारण भौतिक विज्ञान से यारा
समय रहते कर ले पहचान।

धर्म हिन्दू है पुराना 4000  वर्ष
मुस्लिम 1400  का है
क्रिश्चियन है 2000 वर्ष पुराना
सो सब धर्मों में धोखा है
दो अरब पुरानी यह संस्कृति
अपना कर, पकड़ कर चल इसको ऐ मित्र
वरना धोखा खायेगा
एक दिन अवश्य ही तू पछतायेगा।

करा रहा हूँ ज्ञान
सुन ले ऐ बल शक्तिमान
बुद्धि, सहनशीलता सुंदरता  से पूरित
तेरे ये बिगड़ न जाएँ प्यारे गुण
इसलिए प्यारे शाकाहार अपनाना
माँसाहार से कभी न धोखा खाना
हिन्दू धर्म अपनाना
मुस्लिम से तौबा पाना
भौतिक विज्ञान को जान अरे
ये बाह्य पदार्थ का दाता हैं
आध्यात्मिक विज्ञान परन्तु अरे
तेरा तीव्र, आतंरिक, वास्तविक विकास का दाता है।

इसको तू अपनाना
समय रहते सुधर जाना।

यूट्यूब पर सुनें - हिन्दू धर्म ( एडिटेड)

आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा
(स्वरचित)

Monday, June 11, 2018

भला होगा किसी बेआसरे को आसरा देना

भला होगा किसी बेआसरे को आसरा देना।
मुसीबत में किसी मजबूर की बिगड़ी बना देना।

अगर प्यारे तू ये चाहे कि जग में नाम हो जाए।
परायी आग में पड़कर खुदी अपनी जला देना।

तुम्हारे सामने गर हो तड़पता प्यास का मारा।
उसे दो घूंट पानी के दया कर के पिला देना।

करो कुछ काम नेकी के मचाना शोर न हरगिज़।
मगर उसको हमेशा के लिए दिल से भुला देना।

तेरे वीरान जीवन को प्रभु फूलों से भर देगा।
किसी रोते हुए दिल को ज़रा तुम भी हंसा देना।

बहारों में तो हँसते चमन के फूल सब लेकिन।
हो जब हीशान रखता हैं ख़िज़ाँ में मुस्कुरा देना।

तेरे पीछे जो आते हैं किसी को न लगे ठोकर।
मिले पत्थर जो रस्ते में पथिक उसको हटा देना।


(पथिक भजन)

प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा


Sunday, May 6, 2018

श्री भगवान जी का स्वरुप प्रत्यक्ष मानकर 'वन्दना'

श्री भगवान जी का स्वरुप प्रत्यक्ष मानकर 'वन्दना' 

भगवान तुम्हारे मन्दिर में
मैं अपने मंदिर की बात बताने आया हूँ।

तुम तो हो सारे जग के स्वामी, मैं तो तेरा भिखारी हूँ।
एक जपू , जपू न दूजा, मैं तो तेरा ही पुजारी हूँ।
पूजा पाठ की रीत ना जानूँ , मैं तो शीश झुकाने आया हूँ।

नश्वर तन जो तूने दिया, उसमें पहले अपना निवास ठहराया है।
तीन गुणों की माया से इसको नाच नचाया है।
नश्वर तन के दो हाथों से मैं श्रद्धा सुमन चढाने आया हूँ।

खंड पिंड ब्रह्माण्ड सकल में विधि विधि ज्योति समानी।
थाली गगन दीप रवि, चन्दा जौ लख तारा छिटकानी।
फूटी किरण जगत पर पसरी मैं तो यहीं देखने आया हूँ।

जल की झलक अगम की आभा जग जीव आधारी।
अटल ध्यान धर तेरा धरणी भार अठारह धारी।
ॐ सोऽहं शब्द झकारे अनहत बाजे बाजें।
गावन हारे तेरे द्वारे जग जीव बिराजे, मैं तो यहीं बताने आया हूँ।

चार पदारथ तुम्हारे हाथ आठ सिद्धि नव निधि के दाता।
आवागमन का लगा है ताँता  मैं याचक तू समर्थ दाता।
आवागमन से मुझे छुड़ा दो मैं तो यहीं गौरव मांगने आया हूँ।



संग्रहकर्ता
जगराम सिंह 
अध्यक्ष , आर ० आर ० मॉडर्न पब्लिक स्कूल, काजीसोरा 

निवासी ग्राम इस्माईलपुर, जनपद बिजनौर, उत्तर प्रदेश 


द्वारा 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

Friday, May 4, 2018

ॐ नाम निर्गुण की वाणी

सन्तों आओ जी राह में मिलेंगे बड़े सरकार(ईश्वर)।
ॐ नाम निर्गुण की वाणी शब्द है उसकी पेशानी।
वेद पुराण उसका पता बतावें समझे विरला ब्रह्म ज्ञानी।
समझ समझ कर मुक्ति पाए काल पास के बीच न आये।
वह शमाँ है परवाना मैं हूँ एक अलमस्त दीवाना।
अब मुझको आया होश इसमें ना है कुछ उनका दोष।
मैं लुट गया रे मैं मर गया रे अपने कर्मों की मार।

मेष विश्वम्भर तप व्रतधारी जो जुगत और भोग भुगतारी।
आया मुझ में चल आया  संतोष दया उर धारे काम क्रोध मद लोभ गए।
भ्रम का बहुत भगाया रे, ब्रह्मस्वरूप परम तप धारी डूबे जीव को भवपारी।
ज्ञान अगम का लाया रे उसने मेरे कष्ट निहारे सुनकर मेरी पुकार।
ताल बेल जब घर में लागी बह नैन से नीर पड़े पर मुझे सतगुरु मिल गए।
चली न कोई तदबीर यह कमान गुरु कसके मारी शब्द सुरगगी तीर।
हीरा ले गए ऐसा अद्भुत तीर मेरे गुरु की शब्द निशानी।
शब्द में है रे संसार।
राम रूप से रावण मारा कृष्ण रूप से कंस पछाड़ा।
हिरण्यकश्यपु को बलि बनाया सारा जग दहलाया।
भक्त प्रहलाद की रक्षा हेतु नर सिंह रूप बनाया।
तेरी महिमा अजब निराली तेरी महिमा अपरम्पारी।
गोपियों (वेद की ऋचाएं) संग रास रचाई गीता में उपदेश दिए बन के कृष्ण मुरारी।
तुमतो हो वामन रूप रमिया सारे जग के हो रखिया।
अब इस जगजीव का कर दो बेडा पार।


संग्रहकर्ता
जगराम सिंह 
अध्यक्ष , आर ० आर ० मॉडर्न पब्लिक स्कूल, काजीसोरा 

निवासी ग्राम इस्माईलपुर, जनपद बिजनौर, उत्तर प्रदेश 


द्वारा 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

पाइथागोरस के प्रमेय से ब्रह्म को जानना

पाइथागोरस के प्रमेय से ब्रह्म को जानना (शरीर में प्रमाण )




                                                                  सृष्टि

   ब्रह्म                                                         जीव                                            माया (प्रकृति)
अज्ञात                                    मन, बुद्धि, आत्मा, प्राण, संस्कार           पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, प्रकाश
                                                १      २        ३         ४        ५                  १        २       ३        ४          ५


पाइथागोरस प्रमेय के अनुसार समकोण त्रिभुज में कर्ण पर बना वर्ग शेष दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है।  

अतः  



अतः ब्रह्म शून्य है। 

प्रमाण - इस प्रमाण को स्वयं ही प्रयोग करके देखो तो अच्छा है।  जब मनुष्य ॐ का उच्चारण करता है तो ॐ शब्द के साथ बाहर की हवा अंदर जाती है।  और अंदर वाली वायु का बाहर वाली वायु से मिलान जहां होता है वहीँ पर शून्य है।  यहीं क्रिया श्वांस का सञ्चालन करती है।  



१२-०६-२००८                                                                                      
श्री गुरु की कृपा से 
जगराम सिंह 
अध्यक्ष , आर ० आर ० मॉडर्न पब्लिक स्कूल, काजीसोरा 

निवासी ग्राम इस्माईलपुर, जनपद बिजनौर, उत्तर प्रदेश 



द्वारा 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 





Thursday, May 3, 2018

श्रद्धांजलि विधायक श्री लोकेन्द्र जी को

श्रद्धांजलि 

धरती थे अम्बर थे
विनोदी थे समन्दर थे।
जो ग़रीबों के मसीहा थे
वो लोकेन्द्र विधायक थे।
मूरत थे शिवाला थे
अंधेरों में उजाला थे।
जो निडर साहसी नेता थे
वो लोकेन्द्र विधायक थे।
वे एक सच्चे रहबर थे
सब के लिए बराबर थे।
औरों को रोते देखा है
वो देवतुल्य लोकेन्द्र थे।
दिवंगत आत्मा की बात रख लो
प्यार की हर बात उनकी याद रख लो।
हर हाल में ये इलेक्शन जीत कर
दोस्तों इंसानियत की लाज रख लो।
जीवन को अपने कान्ति देदो
दिवंगत आत्मा को शान्ति देदो।
भेड़ियों के झुण्ड का नाश कर
शेर को श्रद्धांजलि देदो।



रचयिता - विश्वपाल सिंह त्यागी, नायक नंगला , 8650209774 


द्वारा
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

Monday, April 23, 2018

ॐ महिमा

अथ ॐ महिमा 

ॐ नाम अनमोल है अमृत का भण्डार धार हृदय में नाम यह होगा बेड़ा पार। 
ॐ नाम अक्षर अविनाशी घट घट व्यापक आनन्द नाशी  सर्व दुःखों का औषध नाम। ॐ नाम जप सुबहो शाम। ॐ नाम आनंद प्रदाता बन्धु सखा भ्राता पितु माता। सच्चा मित्र है केवल नाम ॐ नाम मुक्ति का धाम। 

ॐ नाम सबसे बड़ा इससे बड़ा न कोई जो इसका सुमिरन करे शुद्ध आत्मा होई। 
ॐ नाम हृदय में धार इसकी महिमा अपरम्पार। रिद्धि सिद्धि का दाता ॐ  सिद्ध विनाशक त्राता ॐ। 
इसमें त्राटक खूब लगाओ मनवांछित फल आनंद पाओ।  अंतर्ज्ञान की ज्योति जगाओ पाप ताप संताप मिटाओ। 

ॐ नाम अमृत भरा सर्व सुखों की खान सबसे उत्तम नाम यह करते  वेद बखान। 
वेदों ने है ॐ बखाना शास्त्रों ने इसको है माना। दर्शन शास्त्र करें व्याख्यान ॐ नाम अमृत का खान। 
ॐ की महिमा गाती गीता भक्तों को जो करे पुनीता। ब्राह्मण ग्रंथों का यह सार ॐ नाम की महिमा अपार। 

ॐ नाम में है भरा सब नामों का सार ॐ नाम सृष्टि में हुआ प्रथम विस्तार। 
ब्रह्मा विष्णु और महेश गुणवाचक हैं नाम गणेश। शम्भू शिव शंकर भगवान नाम सभी ईश्वर के जान। 
क्रिया शक्ति व विश्व महान अ  अक्षर के हैं व्याख्यान।  उ अक्षर की महिमा अनंत वायु विरत जगती जड़ पंथ।
म की महिमा कौन बखाने ईश्वर आदित्य प्राज्ञ ही जाने।

ॐ नाम अक्षर बना अ उ म का योग।  इसके शुभ  संयोग से नष्ट भ्रष्ट हों रोग।
महिमा ऋषि मुनियों ने पायी सिद्ध जनों ने मुक्ति पायी।  अन्तर्मुख होकर जब ध्याया ॐ नाम रस अमृत पाया।
अर्थ विचार करे जो जाप उसके नाशे  तीनों ताप।  ॐ नाम में मन जो लगावे चार पदारथ सो जन पावे।

ॐ नाम सुमिरो सदा त्रिकुटी में कर ध्यान ॐ नाम के ध्यान से सिद्ध समाधि ज्ञान।
ध्यान ज्ञान का साधक ॐ  कष्टों का बाधक   है ॐ।  दुरितों  का है भक्षक  ॐ सिद्ध विनाशक रक्षक ॐ।
ॐ नाम की महिमा अभारी ॐ नाम है अति सुखकारी अनुभव सिद्ध ॐ का नाम जिसमें मन पावे विश्राम।

ॐ नाम के धनुष से कर आत्म संधान ब्रह्म लोक को बेधकर हो जा अंतर्ध्यान।
अंतर ज्योति ज्योत जगे जब मन में जब मन में।  जगमग ज्योति जगे जीवन में जीवन में।
ज्योतिर्मय है ॐ प्रकाश करता पाप ताप का नाश। इसमें योगी ध्यान रमाते  और इससे है परम मति पाते।
अमृत ज्योत बहे जब भीतर चंचल चित्त हो वश में ही कर। शोधन वोधन सब हो पावे ॐ नाम जब सहज समावे।

ॐ नाम के जाप का कर प्रतिदिन अभ्यास। भक्ति भाव शुभ भावना रख करके विश्वास।
एक तत्व में ध्यान रमाना निश्चय ईश कृपा है पाना। ईश कृपा है अति अनूप मुद मंगलमय आनंद रूप।
जो मन ईश कृपा को पावे सब जग उसको शीश झुकावे। बाल न बांका हो उस जन का जो स्वामी हो अपने मन का।

ॐ नाम बल तेज को अपने मन में धार। गायत्री का जाप कर जो वेदों का सार।
वेद सार गायत्री है ॐ  उसीका सार ॐ नाम के जाप से मिले मोक्ष का द्वार।
ॐ नाम गायत्री का सार इस के जप से बेड़ा पार। ॐ नाम की शोभा न्यारी भक्त जनों को लगती प्यारी।
जप से दूर न हरगिज़ रहना।  अपना सुख दुःख उससे कहना।

ॐ नाम से सींच कर अपना आप सुधार। आप सुधर कर और का होगा कुछ उपकार।
पर उपकार हृदय में लाना ॐ नाम जप न बिसराना।  सेवा संयम की हो टेक ॐ नाम अंतर में एक।
एक इष्ट की पूजा सुखकर एक देव हो ॐ कृतोस्मर।  एक देव केवल भगवान् ॐ नाम जिसका आस्थान

वेद शास्त्र मिलकर कहें अक्षर ॐ अनूप जिसकी छाया में रहें राजा रंक और भूप।
ॐ कृपा जब ही हो जावे छलना रस्ता झर झर जावे। भव भय बंध करें सब दूर आनंद से कर दे भरपूर।
परमानंद का बोध करावे सुख शान्ति हृदय में लावे। सात्विक भाव का उदय विकास यश और तप का होवे नाश।

ॐ नाम अमृत भरा अतिशय मंगल मूल।  ॐ नाम के जाप से मिटे हृदय के शूल।
ॐ नाम भक्तों का प्यारा, संत जनों को तारन हारा। प्रेम प्रताप बढ़ावे ॐ जगमग ज्योति जगावे ॐ।
ॐ नाम से ज्ञान समाने, ॐ नाम मन चित्त को शोधे। घंटे बजे बजे घड़ियाल ॐ नाम धुन हो तत्काल।

बिन बाजा झंकार हो बिन चंदा उजियार।  ॐ नाम के स्रोत की बरसे अमृत धार।
आनंद वर्षा तब हो पावे ॐ नाम से चित्त लगावे।  रुखा सूखा हो सब दूर ॐ नाम रस से भरपूर।
तृषा बुझे चिंता नहीं आवे जिनसे जब चित्त में छा जावे। तमस मिटे आशा व समता ॐ नाम में मन जब रमता।

ॐ नाम के ध्यान से मन नम हो तत्काल। शुद्ध चेतना ज्ञान से कटे कष्ट विकराल।
ॐ द्वारे काजरकारे घट घट जापे खारे खारे  जब हो वर्शन दर्शन  रुखा अमृत बरसे मधुर सोम का।
पावन हीरा मस्त हो  पावे जीवन हीरा मस्त हो जावे।  दर्शक भी पावे आनंद ॐ नाम है करुणापन्न।
ॐ नाम में सुरति दिखाना कभी भी उसको न बिसराना।

ईश कृपा बरसे जहाँ होवे परमानंद।   परमानंद के योग से मिटे सकल दुःख द्वन्द।
परमानंद पावे जब प्राणी अन्तर्मुख हो जावे वाणी। क्रिया कलाप सकल हो बंद ॐ नाम गूंजे आनंद।
रसना ॐ नाम रस पीवे पी पी कर पापों को धोवे। सुख शांति आनंद का स्रोत ॐ नाम की निर्मल ज्योत।

ॐ नाम की ज्योति से मिटे सकल अज्ञान।  ज्ञान प्रकाशे चित्त में विकसे निर्मल ज्ञान।
ज्ञान बिना जीवन निस्सार ज्ञान बिना  ना कटे अतिहार ज्ञान बिना नीरस सब ग्रन्थ ज्ञान बिना सूझे नहीं पंथ।
ज्ञान बिना बंधन नहीं टूटे ज्ञान बिना साधन सब झूंटे।  ॐ नाम से ज्ञान प्रकाशे ॐ नाम से संकट नाशे।

ॐ नाम प्रगटे जहां सुख सिद्धि का सार।  ॐ नाम के जाप के सुधरें बिगड़े काज।
ॐ नाम महिमा अति भारी जो है अतिशय मंगलकारी। ॐ नाम की पूजा अर्चा ॐ नाम की सुन्दर चर्चा।
ॐ नाम जो रसना गावे तीनों ताप को दूर भगावे।  सबसे दूर हो ३२ पाप जगमग जगमग ज्योति विकास।

ॐ नाम आदित्य है सबसे है अति दूर।  जो उसको उर धार ले जीवन हो भरपूर।
चंचल चित्त जब मन भटकावे चिंता चिता नज़र सब  आवे चिंतन ॐ नाम का करना।
चित्त चंचल से कभी न डरना।  नाम अभ्यास से वश में करना वैरागी बन  धीरज धरना।

दीर्घ प्रणव अभ्यास से चंचल चित्त रुक जाए। अन्तर्मुख हो ध्यान में प्रभु शरण चित्त लाये।
देवों की एक अनुपम नगरी अष्ट चक्र नव द्वारों जकड़ी उसमें एक हिरण्मय कोष सरहित ज्योति से आहोश
ॐ नाम उसमें समावे चेतन भाव तभी जग जावे। जड़ता मिटे अविद्या नाशे जीवन ज्योति हृदय प्रकाशे।

ॐ नाम के नाद उठे मृदुल झंकार जो इसको उर धार ले उसका बेडा पार।
श्रवण मनन करके  निदिध्यासन   निदिध्यासन से निश्चल आसन।  आसन सिद्धि जब हो जावे रिद्धि सिद्धि सब भागी आवे।
चंचल मन पावे विश्राम जब निकले मुख से प्रभु नाम। जो इस नाम में चित्त लगावे जीवन मुक्त हो मुक्ति पावे।

मुक्ति मिले उस भक्त को जिसका शुद्ध आचार सेवा संयम सरलता सत्संग परउपकार।
परउपकार को जो अपनावे जीवन मुक्ति सो जन पावे। पर पीड़ा जो सहे  निरंतर उसका शुद्ध और निर्मल अंतर।
निर्मल मन उद्धार को चाहवे निर्मल मन वांछित फल पावे। निर्मल मन से कटे प्रभात उस जन का हो बेडा पार।

निर्मल मन में प्रगटे ज्योति उत्तम ज्ञान निर्मल मन में उपजे सकल ज्ञान विज्ञान।

ॐ नाम से निर्मल ज्ञान।  ॐ नाम सबसे प्रधान। ॐ नाम निज नाम प्रभु का।
ॐ नाम है प्रेम प्रभु का। ॐ नाम उपमा नहीं पावे। ॐ नाम जो भी जन गावे।
ॐ नाम जपना नित आप। ॐ नाम हरे तीनों ताप। ॐ नाम हरे तीनों ताप।



(श्रीमत दयानन्द विश्वविद्यालय  गुरुकुल चोटीपुरा की ब्रह्मचारिणियों के गाये भजन से। )

प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा