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Monday, March 4, 2019

एयर स्ट्राइक के गुल्ले

शहीद कराओगे कितने मोदी ३०० सीट की खातिर
पूछे केजरीवाल तुम्हीं से पाकिस्तानी है शातिर
गुल्ले में गुल्ला है ये पाकी मुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

कितने बम गिराए कितने ढेर कराये तुमने
पूछूँ मैं सबूत दिलाओ मैं नहीं मानूं क्यूने
ममता भी गुल्ला है ये पाकी गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

अखिलेश वेश में चले देश में करो जाँच दोबारा
पुलवामा में हमला हुआ कैसे भाई ये सारा
नापाक में ताली सेना को गाली दिला रहा है गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

सैटेलाइट पर पिक्चर देखो करो प्रमाणित घटना
एयर स्ट्राइक पर शक है मुझको ये ही मुझको रटना
मोदी झूंठा इमरान है प्यारा सच्चा सुन्दर गुल्ला
भाई रे दिग्गी गुल्ला है जी गुल्ला।

माया जाल बिछाए और जादू काला फैलता जाए
छिपा रहे हो अपनी हारें ये ये घटना कहती जाएँ
ग़ुल्लों में माया है जी गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये तो गुल्ला।

ध्यान भटकाया दम अटकाया मोदी जी ने सबका
सोच समझ कर महबूबा को कम अँकवाया कबका
मुफ़्ती है मुफ्त में छाया गुल्ला
भाई रे गुल्ला है ये गुल्ला।

नई जोत है नई शान है डायलॉग की भाई
कोई धर्म न कोई देश न आतंकी का भाई
सिद्धू को पी एम - पी ओ के ने खिला दिया रसगुल्ला
भाई रे ये भी गुल्ला है ये गुल्ला।

फारुख आन है फारुख शान है इमरान की पीठ थपथपाई
शांतिदूत को देकर बधाई मोदी को दी जंग ख़त्म की दुहाई
गुल्ले में सब से बड़ा पुछल्ला
भाई रे फारुख गुल्ला है ये गुल्ला।

मानो मोदी पी चित अम्बर अम  और टी गुल्ले की
तनाव ख़त्म हो नीति ऐसी ही अपनाना भाई
भाई ग़ुल्लों में है सस्ता गुल्ला
भाई ये गुल्ला है जी गुल्ला।

अम्मार बोलता स्ट्राइक एयर से साँस फट गयी भाई
विदेश मंत्री की साँस रुक गयी जन्नत में हुई रुसवाई
माने दहशतगर्द पाक के सारे मुल्ला
भाई रे विपक्षी गुल्ला हैं जी गुल्ला

सेना का पराक्रम सरकार का शौर्य कुछ भी नहीं है भाया
नापाक को ताली सेना को गाली दिलाता महामिलावट गुल्ला
रसगुल्ला नहीं ये तो गुल्ला है जी गुल्ला

स्वरचित
ब्र० अनुभव शर्मा आर्य





Tuesday, January 22, 2019

आत्मा को अपनी ऐसे सजा


भाइयों बहनों अगर आपको सच्चा मनुष्य बनना है तो ईश्वर ने वेद में बताया है -
 

जीवन को अपने ऐसे सजा जिससे उजाला पूर्ण हो।
मन को तू अपने ऐसे सजा जिससे मधुरता पूर्ण हो ।
तन को तू अपने ऐसे सजा जिससे भरा बल पूर्ण हों ।
बुद्धि को अपनी ऐसे सजा जो ज्ञान से भरपूर हो ।
इन्द्रियों को अपनी ऐसे सजा  जिससे सदा दुःख दूर हो।
प्राणों को अपने ऐसे सजा मृत्यु भी  जिससे दूर हो।
सत्यानंद योगाभ्यास से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
सत्यानंद सत्य से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
सत्यानंद ओ३म् से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
आत्मा को अपनी ऐसे सजा जिससे तुम्हारा मोक्ष हो॥

और ये तभी हो सकता है-

श्वांस श्वांस पर ॐ भज वृथा श्वांस मत खोवे। 
न जाने ये स्वांस भी आये या ना आवन होवे।
परमात्मा हर जगह मौजूद है पर नजर आता नहीं।
योग साधन के बिना कोई उसे पाता नहीं।
रात के चौथे प्रहरों में एक दौलत लुटती रहती है।
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है सो खोवत है।
उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन  कहाँ जो सोवत है।
प्रभु जागत है तू सोवत है।



आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Monday, December 24, 2018

इतिहास की परीक्षा : हास्य कविता

इतिहास की परीक्षा  थी उस दिन, चिंता से ह्रदय धड़कता था।
थे बुरे शगुन घर से चलते ही, बांया हाथ फडकता था।

मैंने सवाल जो याद किये, वो केवल आधे याद हुए।
उनमें से भी कुछ स्कूल तलक, आते आते बर्बाद हुए।

परचा हाथों में पकड़ लिया, ऑंखें मूंदीं टुक झूम गया।
पढ़ते ही छाया अन्धकार, चक्कर आया सर घूम गया।

ओ प्रश्न पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम।

तू लिख दे तेरी जो मर्जी है,ये परचा है या एटम बम।

गीता कहती है कर्म करो, फल की चिंता मत किया करो।
मन में आये जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो।

मेरे अंतर के पट खुले, पर्चे पर कलम चली चंचल।
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल।

मैंने लिखा पानीपत का, दूसरा युद्ध था सावन में, 
जापान जर्मनी के बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में। 

लिख दिया महात्मा बुद्ध, महात्मा गांधी जी के चेले थे। 
गांधी जी के संग बचपन में, वे आँख मिचोली खेले थे। 

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था,
अकबर ने हिन्द महासागर, अमरीका से मंगवाया था। 

महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था,
औरंगजेब रंग में आकर, औरों की जेब काटता था। 

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे,
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे मेँ लिख मारे।

जो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख,
बोला इन सब छात्रों में, बस होनहार है यहीं एक।

औरों के पर्चे फ़ेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए,
जीरो नंबर देकर बाकी के, सारे नम्बर काट लिए।


कवि - ॐ प्रकाश आदित्य

संकलन - ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Wednesday, June 20, 2018

हिन्दू धर्म अपनाना

मन से मोह विचार कर
रख कर्त्तव्य का ध्यान
योगारूढ़ मस्तिष्क से कर
सामाजिक रीतियों का ज्ञान
कहता हूँ मन की अपने मैं
ना जानूँ वेद पुरान
पर सत्य लिखूँ और सत्य वचन
ही है मेरी बिलकुल बस पहचान।

शाकाहार से तृप्त हो
कर निर्गुण का ध्यान
पुरुषारथ परमारथ व ज्ञान कर
पुस्तक उपनिषद और वेद से
पाले आध्यात्मिक विद्या का भान
तू करले धर्म को प्यार अरे
करवाता हूँ मैं भान
गर नियम यहीं अपनाएगा
करेगा गहन विज्ञान का पान
हो जाएगा मृत्यु विजय तू
यह सत्य वचन कर ध्यान।

गर मांसाहार अपनाएगा
नहीं कभी कर पायेगा जीवन में
आध्यात्मिक विज्ञान का ज्ञान
यह विज्ञान है श्रेष्ठ 25 गुण
साधारण भौतिक विज्ञान से यारा
समय रहते कर ले पहचान।

धर्म हिन्दू है पुराना 4000  वर्ष
मुस्लिम 1400  का है
क्रिश्चियन है 2000 वर्ष पुराना
सो सब धर्मों में धोखा है
दो अरब पुरानी यह संस्कृति
अपना कर, पकड़ कर चल इसको ऐ मित्र
वरना धोखा खायेगा
एक दिन अवश्य ही तू पछतायेगा।

करा रहा हूँ ज्ञान
सुन ले ऐ बल शक्तिमान
बुद्धि, सहनशीलता सुंदरता  से पूरित
तेरे ये बिगड़ न जाएँ प्यारे गुण
इसलिए प्यारे शाकाहार अपनाना
माँसाहार से कभी न धोखा खाना
हिन्दू धर्म अपनाना
मुस्लिम से तौबा पाना
भौतिक विज्ञान को जान अरे
ये बाह्य पदार्थ का दाता हैं
आध्यात्मिक विज्ञान परन्तु अरे
तेरा तीव्र, आतंरिक, वास्तविक विकास का दाता है।

इसको तू अपनाना
समय रहते सुधर जाना।

यूट्यूब पर सुनें - हिन्दू धर्म ( एडिटेड)

आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा
(स्वरचित)

Thursday, March 15, 2018

हे ज्ञानवान भगवन

हे ज्ञानवान भगवन हमको भी ज्ञान दे दो।

करुणा के चार छींटे करुणानिधान दे दो।
हे ज्ञानवान भगवन हमको भी ज्ञान दे दो।

(सुलझा सकें हम अपने जीवन की उलझनों को)-2 । जीवन की उलझनों को।
प्रज्ञा ऋतम्भरा से बुद्धि का दान दे दो।

अपनी मदद हमेशा खुद आप कर सकें हम।  खुद आप कर सकें हम।
इन बाज़ुओं में शक्ति हे शक्तिमान दे दो। 

उपकार भावना से निर्भीक सत्य वाणी। निर्भीक सत्य वाणी। 
मीठे ही शब्द बोलें  ऐसी ज़बान दे दो। 

दाता तुम्हारे घर में किस चीज़ की कमी है। किस चीज़ की कमी है। 
चाहो तो निर्धनों को दौलत की खान दे दो। 

तुम देवता हो सबकी बिगड़ी बनाने वाले। बिगड़ी बनाने वाले। 
जीवन सफल बने जो थोड़ा सा ध्यान दे दो। 

डर है पथिक तुम्हारा रस्ता ना भूल जाएँ। रस्ता ना भूल जाएँ। 
भक्तों की मंडली में हमको भी स्थान दे दो। 

प्रस्तुति 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

Wednesday, February 14, 2018

ओ सुप्रीम पावर गोड!

ओ सुप्रीम पावर गोड!


परमात्मा सदा अदृश्य है,
वह है लेकिन अदृष्ट है ।
कोई भी सूक्ष्मदर्शी आत्मा  को ही नहीं देख सकता ,
तो फिर परमात्मा को देखना कैसे सम्भव है?

वह है वायुवत, आकाशवत।
जिसे अनुभव तो हैं कर सकते पर देख नहीं सकते।
जानते उसे हैं  समाधिस्थ बुद्धि से।
यही तथ्य है मेरा मत ।

उसकी प्रतिमा बन नहीं सकती ।
न वह मानव रूप में कभी जन्म लेता।
वह अपने समस्त काम पूरे खुद है कर सकता,
जैसे रावण या कंस को मारना,
बिना जन्म लिए या मृत्यु को पाए
क्योंकि वह है सर्वशक्तिमान।


आदरणीय मैं आपको हूँ प्रेम करता।
आप माँ  दुर्गा हो, आप माँ काली हो,
आप पिता राम हो, आप पिता कृष्ण हो,
आप पिता शिव हो, आप पिता ब्रह्मा हो।

भगवान कृष्ण , भगवान राम, भगवान् ब्रह्मा, भगवान् शिव,
और मेरे गुरु थे बहुत ही ऊँचे लेकिन,
तुम राम हो क्योंकि हो सर्वव्यापी।
तुम कृष्ण हो क्योंकि  हो महायोगी ।
तुम ब्रह्मा हो क्योंकि तुमने है ब्रह्माण्ड बनाया ।
आपका मुख्य निज नाम ॐ है क्योंकि आप हमारे लिए हो करते सब कुछ।

ओ प्यारे पिता मैं आपको हूँ प्रेम करता ।
मैं हूँ लेना चाहता आपके कुछ गुण ।
और मैं प्राप्त कर लूँगा निश्चित
यदि चाहो आप,
वरन  कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता
यदि चाहो नहीं आप ।
मेरा है नहीं कोई
क्योंकि आप चाहते हो ऐसा ही ।

परन्तु पृथ्वी मेरी है।
अग्नि मेरी है।
वायु  मेरी है।
आकाश मेरा है।
जल मेरा है।
जो मैं माँगूँगा आपसे मिलेगा मुझे , मैं जानता  हूँ।

ओ प्यारे पिता!
ओ महानतम कवि! जिसने सबसे बड़ी कविता वेद है बनाया,
मैं भी एक छोटा कवि बनना हूँ चाहता।
मैं जानता हूँ कि आप सब कुछ हैं समझते जो मैं चाहता हूँ!
इसलिए कृपया मुझे वो सब दो,
जो मेरी हैं आवश्यकताएँ।
परन्तु मुझे ऐसा बना देना प्रभु!
कि मुझे अवसर मिले ही नहीं,
कोई बुरा कर्म करने का !

यूट्यूब पर सुनें - ओ सुप्रीम पावर गॉड 

Read its English Translation

आपका
भवानंद आर्य "अनुभव"

Awaking our Destiny, Bharat is now Awaking

Awaking our Destiny, Bharat is now Awaking

Yoga, Yajna and Prayers for God is Being performed
Again prosperity, Wealth, Knowledge as well is being rained

Religion, Prosperity and Desires, Salvation we desire
We are everything, Everything we acquire
Ignorance, Darkness, bad luck and Sorrow are infinitely waiting

Awaking our Destiny, Bharat is now Awaking

Internal Power is Waking Up, with Strength body has filled
With adding Spirituality to Science We are pleased and thrilled
Let We be with instruments or without, the Love is enrolled
Our heart is singing with the grace God duly filled

Awaking our Destiny, Bharat is now Awaking

Let us together chant the god's song
After removing enmity Move to God's lap
Let the country again become Teacher of the world
The national religions must become Vaidic with no excuse in every nation
Vaidic Chanting, One Culture, Politeness and Punishment must we have
O Celibacy Observer! Identify your Vishnu incarnation

Awaking our Destiny, Bharat is now Awaking

(Selfmade)




Truly
Brahmchari Anubhav Sharma Arya 'Bhawanand'

Wednesday, December 13, 2017

कविता : मृत्यु

मृत्यु 

एक वन है ये संसार
गरज रहे है जहाँ वनराज
और रहे हाथी चिंघाड़
आग लगी है उसमें तीव्र
वहाँ फँसा है एक फ़र्द
करता प्रभु से वह पुकार
दे दो मुझको जीवन दान।


एक वृक्ष दिया उसे दिखाई
जो जलाशय के है पास
चढ़ा पेड़ पर हो के उदास
देखा उसने एक सर्प को
चढ़ ऊँची शाखा के पास
सर्प उसी के पास को
आता दिया दिखाई।

देख छह शिर के हाथी को
नहीं युक्ति कोई पायी
देख तोड़ते उस वृक्ष को
कुछ न देता उसे सुझाई।

साथ देख चूहे काले सफ़ेद
कुतरते शाख उसी को
जिस पर बैठा मानव धीर
बहुत भय से हुआ अधीर।

टपक रहा ऊपर शहद को
देख शांति उसने पाई
भूल गया उस मौत को जो अब आई अब आई

बोले विदुर धृतराष्ट्र से
क्या है इस जीवन का सार
यहीं दीखता है ये संसार

प्राण ध्वनि है बनी है चिंघाड़
अग्नि है गर्भाशय की
और वृक्ष है ये संसार
अवश्यम्भावी है ये मृत्यु
सर्प रूप में देती दिखाई
बचने की इस मृत्यु से
नहीं युक्ति देती कोई सुझाई।

छः ऋतुएं हैं सम हाथी के
चूहें हैं ये दिन और रात
काम क्रोध मद मोह लोभ
मत्सर हैं शहद के रूप
इस तरह मधु चाह में
भूले बैठा है मृत्यु को।


विशेष:

आने वाली मृत्यु पर
रोते हैं ये सब ही क्यूँकर
मरता है पञ्च भौतिक शरीर
या हमारी आत्मा
जब आती है ये मौत
पञ्च तत्व मिलें पांच में
और आत्मा कभी नहीं मरे।

न ही ये कभी जले
न सुखाई जाये
न ही ये कभी भीगे
इस तरह हम जान गए
मृत्यु शब्द है अज्ञानी का
ये मरने पर भी नहीं मरे
आये ये यम वायु से

जायेंगे यम वायु में
जब जन्म लें कभी
तब मृत्यु भी है सही।

तभी तो यह उक्ति ही है सही
भस्मन्तम् शरीरम्
गति शरीर की है सही
समझो जो मर गया
समझो शरीर न मरा
न कहीं गया
प्राण थम गए क्यूँकि
आत्मा गया
मित्रों! कर्मों की गति से
कहीं और को गया
आत्मा अमर है
इसलिए न रोओ सखे!
यही वचन है मेरी शिक्षा।

(स्वरचित)

आपका अपना
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

Tuesday, November 14, 2017

बैरक १४ - ए

कुछ मुख्य व्यक्ति 
बैरक १४ - ए  पर एक कविता


सन २०१४ अक्टूबर में मेरे ऊपर चार तीन मुक़दमे (झूंठे ) स्व पत्नी के द्वारा डाल दिए जाने के कारण  मुझको जेल जाना पड़ा था। वहाँ की यादें मुझे झकझोर देती हैं।  मैंने वहाँ लेखन कार्य किया था और कुछ कवितायेँ भी बनाई थीं।  उनमे से एक प्रस्तुत है - (कृपया यदि पसंद आये तो कमेंट करना न भूलें )-



यहाँ हैं पंडित पूरे  पाँच। 
विपिन, अरुण, नीरज, गौरव और मैं। 
सब ही बैरक के रखवारे हैं। 
नहीं ये जातिवाद, झगडे के पोषक। 
ऊँची शिक्षा वाले हैं। 


[विपिन पाण्डेय ]
कुशल गणित विद्या में हैं राईटर 
पंडित जगन्नाथ महाराज 
जिन्हें देख सुन शान्त हो जाते बंदी 
ऐसी फितरत वाले हैं। 
शांत, प्रसन्न व कुशल चंद्र सम 
ऊँची क़िस्मत वाले हैं। 
प्रिय, मधुर, तीखी, मधुर वाणी 
सब ही मुख में धारे हैं। 


[करतार सिंह ]
एक हैं नेता जी करतार 
कुशल वचन भाषण में उनके 
है उनकी माया अपरम्पार 
सिंह समान गरजे हैं अबके 
मंच हो, सभा हो या हो बंदी स्थल 
शुद्ध श्वेत परिधान भारतीय 
टोपी, बण्डी सब उनकी शान 
है स्वदेशी, स्वदेश तथा भारतीयता की पहचान 
प्रशंसा सदगुणी व्यक्ति की करना है 
उनकी वाणी में विद्यमान 
बांटना, सत्कार करना व मग्न रहना 
उनके ये गुण निश्चित ही हैं महान 


[सोमपाल सिंह चौधरी ]
सुबह सवेरे ब्रह्म मुहूर्त में 
नित्य ही जाग जाते हैं। 
साधु सामान व्यवहार है जिनका 
चौधरी सोमपाल कहलाते हैं। 
दुष्टता, दुर्व्यसन, दूरिता से दूर 
प्रभु भक्ति के नशे में चूर 
सम्भला हुआ कर्म है जिनका 
ब्रह्मचारी कृष्ण दत्त जी को चाहने वाले हैं। 

 [अनुभव शर्मा ]
कुछ प्रभु भक्त, कुछ दुनिया भक्त 
कुछ वैराग्यवान, कुछ कामवान 
कुछ पढ़ा लिखा, कुछ उन्मादी 
पर हूँ परेशान इस झूठी दुनिया से 
पर सच का मै रखवारा  हूँ। 
गुरुओं, माला, प्रभु और बालियों से डरने वाला हूँ। 
मैं भवानन्द शर्मा अनुभव 
सारे कारागार का प्यारा हूँ। 
मैं छोटी क़िस्मत वाला हूँ। 
पर यज्ञ देव का प्यारा हूँ। 

[नीरज शर्मा]
धन, वैभव, कीर्ति जिसके घर 
ऐसी क़िस्मत वाले हैं। 
वशिष्ठ गोत्र के स्वामी जो हैं 
नीरज शर्मा प्यारे हैं। 
गुण अनेक और अवगुण एक 
धैर्य, सहनशीलता मन में धारे हैं। 


[नैन सिंह]
डॉक्टर नैन सिंह बाष्टा वाले। 
हैं अधिकतम सदगुणों के रखवाले। 
नाश, क्रोध व व्यर्थ की बातों। 
में न उनका ध्यान, बनेंगे अत्युत्तम इंसान 
करेंगे परिवार, ग्राम, प्रदेश व देश का। 
योग व अध्यात्म से तथा बीमारों के इलाज से। 
अत्यधिक उत्थान। 

[अरुण शर्मा]
वाणी से कटु बहुत हैं भाई। 
दिल से हैं दुखी, और अत्यधिक परेशां 
कानून, समाज व परिवार से है इनको कुछ शिकायत भी 
मगर करते हैं पुरुषार्थ, सेवा तथा रखते है। 
महापुरुष, वेद, गीता में श्रद्धा अति महान 
ये भी हैं देश की अमर संतान। 



[मौ० साबिर पहलवान]
अल्लाह के बन्दे, प्रेमी, परोपकारी व बलवान 
नहीं हैं लेते रोज प्रभु का नाम, मगर 
जुम्मे की नमाज़, नहीं छोड़ते साबिर पहलवान।
याद है इनको हर गुर परोपकार का
करते हैं नए लोगों से पहचान और
दया दान नम्रता की मूरत
जैसे कोई अल्लाह की अच्छी संतान।


[जगराम सिंह सैनी ]
सैनी समाज से हैं भाई जगराम
अच्छाई, भक्ति, निर्देशन व सुविचार।
सब हैं इनकी अपनी ही पहचान।
याद सभी हैं सभी युक्तियाँ तथा विचार
दे सकते हैं अपनत्व व देश की खातिर
ये, अपनी जान, मगर जीवन है वीरान
कानून अंध के पंजे से हैं ये भी परेशान
प्रभु बचाये इनको, परिवार को, यहीं है मेरी तान। 


योग, सदाचार, पुरुषार्थ और कर्त्तव्य 
सब ही गुण ये न्यारे अति प्यारे हैं 
उपासना, कर्म, ज्ञान और  
सब अपने रखवारे हैं साइंस 
और मुक्ति को देने वाले हैं। 
इसलिए दिल में सब हमने, तुमने और उन्होंने उतारे हैं, रहे हैं और 
उतारेंगे 
निस्संदेह 
अवश्य। 



भाइयो बहनों इस प्रकार साम नीति के प्रयोग से हम अपराधियों को भी वश में कर सकते हैं, और उनको सन्मार्ग पर लाकर वास्तविक देशभक्त नागरिक के रूप में सुधार लाने में सफल हो सकते हैं। 



आपका 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 
(१-२-२०१५ को जेल बिजनौर में लिखी )

Sunday, March 12, 2017

सेक्युलरिज़्म



ओ३म्

सेक्युलर भारत



जन्म लिया जो इस धरती पर कुछ होगी मुझमें अच्छाई।
सदाचार अपनाया मैंने और पाई सच्चाई ।
इस पृथ्वी पर भारत में जो पाया जन्म यह दुर्लभ।
भारत में भी शांत ग्राम है मेरा कर्म क्षेत्र जो भाई ।

स्वर्ग यहीं है मेरे देश में और मैं आज ही ज़िन्दा हूँ।
पर मेरे देश के सेक्युलरिज़्म से मन ही मन शर्मिंदा हूँ।



गई छोड़कर कांग्रेस और साइकिल और यह बसपा भी।
ले आई यूपी और यूके भाजपा का बस्ता भी।
जय जय मोदी हर हर मोदी घर घर मोदी आया है।
उम्मीदों ने पंख खोल कर लोकतंत्र अपनाया है।
भूतकाल के अत्याचार और दुराचरण से मेरा दिल घबराया है।
मैंने अपनी छाती पर अन्याय का ख़ंज़र खाया है ।

मैं कुशासन अन्याय के पोषक संविधान पर मन ही मन शर्मिंदा हूँ।
लगता है मैं क्यूकर अब भी सेक्यूलरिज़्म में ज़िन्दा हूँ।

मेरी कथा जो जेल सही है और पापों से था मैं दूर सुनो।
कद्दावर शातिर अपराधी थे मेरे चारों ओर सुनो।
फिर मुझे पापों का भाई क्यूँ कर ऐसा दंड मिला ।
क्यूँ निरपराधी जनता सहती है,  है जो अत्याचार खिला।
आज वजह है मूरख काले अंग्रेजों के कारण की।
३४ हज़ार काले उन नकल वाले क़ानून भयावह की।


सब लोगों से मैं हूँ बहुत दूर और आज जेब से मंदा हूँ।
इसीलिए मैं सेक्रुलरिज़म के फ़ंडे से शर्मिंदा हूँ।

इसीलिए हूँ शर्मिंदा और साम्प्रदाय जातिवाद से भी शर्मिंदा हूँ।

यह चीन बौद्ध है ब्रिटेन है क्रिश्चियन और पाक है मुस्लिम जी।
और अपना भारत न हिंदुस्तान है और न ही यह इंडिया जी।
सेकुलर भारत सेकुलरिज़्म भारत की हो गई पहचान है क्यूँ।
भारत तेरे लोगों की पहचान यहाँ पर खो गई क्यूँ ।

मन ही मन मैं सेक्युलरिज़्म की करता भाई निन्दा हूँ।
सेक्युलरिज़्म के फ़ंडे भाई तुझ से ही शर्मिंदा हूँ ।

ब्रह्मचारी अनुभव आर्यन्
(स्वरचित)

Saturday, February 25, 2017

आए न सावन


आए न सावन


क्या करूँ भगवन आए न सावन।
बीते जाए दिन छिन आए न सावन।

जब तक  मिल न जाए तू सावन का अस्तित्व नहीं है ।
जब तक प्राण गँवा न दूँ अपना कोई चरित्र नहीं है।
जब तक मौज बहारें हैं सावन है पर तू ए मित्र नहीं है ।

क्या करूँ भगवन आए न सावन।

कर्म नाम पर भोग हैं धर्म नाम पर मौजें हैं।
पर ए मित्र इस स्वर्ग धरा पर तेरा तो अस्तित्व नहीं है।
तेरा अस्तित्व तो तब ही होगा जब धर्म कठिनाई और कर्म निष्काम।
अपनाए जाएंगे और वेद ज्ञान के विज्ञान जनाए जाएंगे ।

क्या करूँ भगवन आए न सावन।

पर मानव मौजें लेता है और खूब मजे में मस्त है।
और पितरयाण पर जीता है और आस आप की रखता है।
मानव मानव नहीं गद्दार धर्म के नाम है अत्याचार ।
तभी आए न सावन भगवन ।
तभी बंद हैं पावन कविता ।
तभी बन्द है सावन।

क्या करूँ भगवन आए न सावन।

धर्म नाम पर दृढ़ श्रम हो।
और धर्म नाम पर पूजा भी।
धर्म नाम पर सत्य ज्ञान को पढ़ते रहें पढ़ाते भी।
तो सावन फिर से आएगा।
तो जीवन फिर से आएगा।
स्वर्ग यही आ जाएगा।
हाँ स्वर्ग यहीं मिल जाएगा।
यही मिलेगा तू भी भगवन
यही देवता आएंगे।

पर क्या करूँ भगवन आए न सावन।
बीते जाएं दिन छिन आए न शुभ दिन।



ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा
(स्वरचित)

Friday, February 24, 2017

मेरे भीतर बहुत क्रोध है

मेरे भीतर बहुत क्रोध है

मेरे भीतर बहुत क्रोध है।
करना इसका मुझे शोध है।
मेरे भीतर बहुत क्रोध है।

प्रिय की ये मीठी मुस्कान।
भरती क्यूँ जीवन में प्रान।
फिर क्यों बिछड़ गए हैं मीत।
कैसा ये रौरव संगीत।
गति का कैसा गतिरोध है।
मेरे भीतर बहुत क्रोध है।

मदमस्त और मधुमस्त बसंत।
लेकर आता क्यूँ है अंत।
तपती सूरज की ये किरनें।
फिर है ग्रीष्म ऋतु क्यों लाती।
इसका मुझको नहीं बोध है।
मेरे भीतर बहुत क्रोध है।

उलटे सीधे चक्र चलाकर।
किया इकट्ठा धन ये लाकर।
घर भर डाले तुमने अपने।
मिटे ग़रीबों के सब सपने।
होना इस का भी विरोध है।
मेरे भीतर बहुत क्रोध है ।

प्रभु से प्रीत लगा कर देखी।
यहीं पे जन्नत पा कर देखी।
अब क्यूँ दूर हुए हो आप।
मैंने कैसा किया था पाप।
प्रभु का ही ये सृष्टि बोध है।
मेरे भीतर बहुत क्रोध है ।

करना इसका मुझे शोध है।
मेरे भीतर बहुत क्रोध है ।

(पूज्य पिताजी की क़लम से )

इस कविता को उर्दू में पढ़ें
आपका अपना
भवानंद आर्य

मैं तो तेरे पास आ रहा हूँ


ओ३म्



दुनिया से दूर जा रहा हूँ।
और तेरे पास आ रहा हूँ।
मैं ओ प्रभु!

जिस तरहा बिजली तारों में समाई है।
जिस तरहा वायु जगत में भरमाई है।
है,  परन्तु देखी नहीं जाती।
उसी तरहा तेरी हस्ती इस संसार में मैंने पाई है।


चढ़ते सूरज से ज्ञान पा रहा हूँ।
और तेरे गुण गान गा रहा हूँ।
मैं ओ प्रभु!

चाय में चीनी और तपते गोले में अग्नि का अस्तित्व।
देख ह्रदय में मेरे हो चली है तेरी ही यादें मय चित्र और चरित्र ।
कब पूर्ण होगी मेरी साधना  इस बात की है मुझे बहुत तीव्र कामना ।

तुझे मिलने की आस पा रहा हूँ।
तेरे पहलू में ही मैं आ रहा हूँ।
ओ प्रभु!

ह्रदय में हो अंगुष्ठ मात्र आप ऐ स्वामी।
और जगत है सारा तूने अपने भीतर समेटा।
कहाँ कहाँ और है तेरा राज्य व निवास ।

तेरी हस्ती का पार नहीं पा पा रहा हूँ।
मैं तो तेरे पास आ रहा हूँ।
ओ प्रभु!


दुनिया से दूर जा रहा हूँ।
और मैं तेरे पास आ रहा हूँ।
ओ प्रभु!


प्रभु तेरी शरण में

यूट्यूब पर सुनें - मैं तो तेरे पास आ रहा हूँ 


ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा
(स्वरचित)

Thursday, August 11, 2016

O Supreme Power God!

The god is always unseen. 

He exists but in invisible mode.
Any microscope can not view the soul even.
Then how is it possible to view the god?

He is like the space, like wind.
To which we feel and can't view.
He is known by meditated wisdom. 
It is the fact according to my view.

No idol is possible of Him.
He never takes birth as man
He can complete all works of him,

Like killing Ravan or Kans,
Without taking birth and coming to death,
Because he is omnipotent.

I Love you my respected.
You are Maan Durga.
You are Maan Kali.
You are Father Ram.
You are Father Krishna.
You are Father Shiva.
You are Father Brahm.


Lord Krishna, Lord Ram, Lord Brahma, Lord Shiva 
And my guru were very high but
You are Ram cause you live everywhere (rameti).
You are Krishna cause you are Maha Yogi.
You are Brahma cause You made the world.
Your main name is om cause you do everything for us.

O dear Father I love you
I want to get some properties of you
And I shall surely get
If you want
Else nobody can help me
If you don't want.
No one else is there of mine
Cause you don't like it.

But the earth is mine.
The fire is mine.
The air is mine.
The space is mine.
The water is mine.
I can get whatever I wish from you, I know.

O dear father!
O Greatest Poet You made the greatest poetry as Vedas.
I want to become a little poet.
I know you understand everything what I want.

So please grant me those things,
What I need.
But make me like,
That I may not get the chance 
To do evil deed. 

Listen it on YouTube - O Supreme Power God!

Read its Hindi Translation

Truly
Bhavanand Arya 'Anubhav'

Saturday, July 2, 2016

जाग रहा है भाग्य हमारा

जाग रहा है भाग्य हमारा जाग रहा है भारत देश।
योग, यज्ञ, उपासना प्रभु की करने लगा है क्योंकि देश।
फिर से धन, ऐश्वर्य और ज्ञान हम पर हुआ मेहरबां है।
धर्म, अर्थ और काम मोक्ष की आस हमें ऐ नादाँ है।


सब कुछ हम पर है, हम सब कुछ हैं।
छूटा अज्ञान, अन्धकार, अशुभ  और क्लेश।

जाग रहा है भाग्य हमारा जाग रहा है भारत देश।


बल अंतर का जाग चुका है बल शरीर में आया है।
आध्यात्मिकता व भौतिकता का मिलन हमें यूँ भाया है।
आज दूर यंत्रों से हों या न हों प्रेम घुमड़ कर छाया है।
कृपा प्रभु से आत्म विभोर हो ह्रदय हमारा गाता है।


जाग रहा है भाग्य हमारा जाग रहा है भारत देश।


आओ सभी इस परम पिता के लिए गीत मिल गायें।
दूर शत्रुता करके फिर से प्रभु शरण हो जाएँ।
बन जाने दो इस देश को फिर से विश्व गुरु ऐ यारों।
हो जाये निष्कंटक जिससे राज्य धर्म वैदिक का।


शंख, चक्र अपनाओ फिर से पद्म, गदा धारो तुम।
ऐ ब्रह्मचारी विष्णु रूप अपने को पहचानो तुम।


जाग रहा है भाग्य हमारा जाग रहा है भारत देश।


(स्वरचित)

इस कविता को अंग्रेजी में पढ़ें 


चित्र : आधुनिक भीम, भारत (डॉक्टर विश्वपाल जयंत, कण्वाश्रम, कोटद्वार)

आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Thursday, February 12, 2015

Message to Youngsters

युवाओं को सन्देश 

ऐ जवान तुम बड़े महान , चाल तेरी धरती की शान 
क्रोध तेरा भारत की आन , काम तेरा है सुन्दर तान 
हल्का लोभ है बड़ा शैतान , प्यार मुहब्बत करेगी तुझे परेशान। 

पर तू है भारत की जान , तेरा कोई नहीं है सिवा भगवान 
तेरा कोई नहीं बिना ज्ञान विज्ञान , भर दे अपने जीवन में जान 
कर दे पूरी भारत माँ की ऐ संतान, आन शान मान सम्मान और बान 

जाग पड़ो ऐ वीर जवान, छोडो अब ये बस अभिमान 
तेरा जीवन रहा है दुखो की खान, पर तू है सच्चिदानंद की जान 
तुझको जीवन देना है दान, मुझको माँ भारत को ओ संतान!

कर दे पूरा संकल्प तू अपना, जो है तेरे ही दिल की शान 
और करा रहा हु तुझको ध्यान, तू कर ले पापों से दुरी यारा
बन जा फिर से शक्तिमान। 

कर्म करेगा साध कर गर तू, बन जायेगा ऐश्वर्यवान 
धन आएगा तीव्र गति से, हर पल हर दिन ऐ बुद्धिमान 
जाग अरे तू ऐ वीर जवान, कर दे इस भारत को फिर से 
धनवान शक्तिमान और सदगुणों की खान। 

सुन ऐ वीर जवान, सुन ऐ वीर जवान
छेड़ दे ऐसा तराना कर्म का, जो हो जाए तेरा जीवन फिर महान 
रख पाये तू परिवार देश व ऋषि मुनियो  वैज्ञानिकों की , आन शान मान कीर्ति महान। 

ऐ जवान तुम बड़े महान, तुझको जीवन देना है दान 
घर को गाँव को देश को और, देव ऋषि भारत को व 
कठिन कर्म निष्ठां को यारा, बन जा फिर से शक्तिमान। 

(स्वरचित)
अनुभव शर्मा आर्य 'भवानन्द'



Message to Youngsters

Ae jawan tum bade mahaan, Chal teri dharti kee shan, 
Krodh tera bharat kee aan, Kam tera h sunder tan, 
Halka lobh h bada shaitan, pyar muhabbat karegi tujhe pareshan- 
Par tu h bharat ki jaan, tera nahi h koyi siva bhagwan, 
Tera nahi koyi bina gyan vigyan, bhar de apne jivan me jaan, 
Kar de puri bharat man ki ae santan! Aan shaan maan samman aur baan.
Jag pado ae vir jawan, Chhodo ab ye bas abhiman, 
Tera jivan raha h dukho ki khan, Par tu h sachchidanand kee jaan, 
Tujko jivan dena h dan, Mujhko maa bharat ko o santan! 
Kar de pura sankalp tu apna, Jo h tere hi dil ki shan, 
Aur kara raha hu tujhko dhyan, Tu kar le paapo se duri yara, 
Ban ja phir se shaktimaan.
Karm karega sadh kar gar tu, Ban jaega aeshvaryawan, 
Dhan ayega tivr gati se, Har pal har din ae buddhiman, 
Jag are tu ae vir jawan, Kar de is bharat ko phir se shaktiman dhanwan aur sadguno ki khan, 
Sun ae jawan sun ae jawan, ched de aesa tarana karm ka, 
Jo ho jae tera jivan phir mahan, rakh paye tu parivar desh v rishi muniyo v vaigyaniko ki, 
Aan shan maan kirti mahaan,
Ae jawan tm bde mahan, Tjko jivan dena h dan,
Ghar ko gao ko desh ko aur,Dev rishi bharat ko v, 
Kathin karm nishtha ko yara, Ban ja phr se shaktimaan.

(Self Made)
Anubhav Sharma Arya 'Bhavanand'

Tuesday, February 10, 2015

ये जेल है

अपमान रूपी अमृत की ये खान है ये जेल है। 
धारा ३७६, ३०२, ३९६ भी खूब हैं ये जेल है 
४९८, ४०६, ३२३ व ६०५ के मुर्गे खूब हैं ये जेल है। 
चार सौ बीसी, चोरी, लूट, डकैती ये श्राप हैं ये जेल है 

कुछ कर कर के हैं पछता रहे, कुछ करने को मजबूर हैं। 
कुछ झूठ के बल आ फंसे कुछ जानबूझ लाचार हैं 
पर कर रहे सब कर्म हैं छोड़ा कुछों ने धर्म है 
बेकार थे या बेकार हैं नादान थे या नादान हैं 
पर शुक्र है कि वो नहीं अनुचान हैं ये जेल है  . 

कुछ दोष अपने अपनों का था कुछ दोषी अभी क़ानून है 
ये थे तो सारे अंग्रेजी ही पर अब भी कुछ तो हैं वहीँ 
संख्या में चौतीस हजार(३४७३५) हैं लन्दन की यादगार हैं 
महारानी विक्टोरिया जी की ही शान हैं ये जेल है  . 

पर चुप रहो ये जेल है जोड़ा बना कर के चलो ये जेल है 
आदरणीय जेलर सर, डिप्टी सर, चीफ सर व हेड सर 
सब के सब नाराज़ हैं क्यूंकि ये जेल है 
पर हम से क्यों नाराज़ हैं हम ने कर दिया ऐसा क्या पाप है

कहते थे एक साहब हैं कि हर तरह का कर्म हो
जो आता न हो तुमको भाई ऐसा नहीं कोई कर्म हो
पर कर्म वो सत्कर्म हो ये नहीं कि दुष्कर्म हो
पर अनुभव तू तो टीचर हैं फिर बन गया क्यों प्रीचर हैं
क्या करें हम भाइयों जब अपनों ने ठुकरा दिया
तभी तो कोई दूसरा है हमको अपना बना गया।

करता हूँ नम्र निवेदन मैं अरे इस भारतीय सरकार से
तब एक (फूट डालो) थे अब चार (साम , दाम, दण्ड , भेद) हैं
फिर क़ानून क्यों नहीं चेंज है
क़ानून कुछ अंग्रेजी थे स्वतन्त्र भारत के
और अब भी नहीं कोई चेंज हैं नहीं चेंज हैं

भूमि अधिग्रहण का क़ानून, मौजूद था मौजूद है
जब जनरल डायर ने डायरेक्ट किया सिपाहियों को
तो उनकी वर्दी खाकी थी तो अब भी रंग क्यों सेम है
हम आज़ाद हैं और यहाँ पर लोकतंत्र है
तो क्यों नहीं है अधिकार साधारण मानव को
बोलने का, अपनी बात, स्वतंत्रता से, क्यूं ये भ्रष्टाचार है

क्यों मंदिर मस्जिद का विवाद है
क्यों नहीं बेटी हमारी सेफ हैं
क्यों नहीं अब भी हम स्वतंत्र हैं
जबकि, कहते हैं, देश ये हमारा प्रजा का ही तंत्र हैं।

क्यों नहीं बराबरी का अधिकार है
क्यों नहीं धन का वितरण सामान है
क्यों ये बेरोज़गारी है
जबकि नीतियां हिंदुस्तानी हैं

कारण मैं बताऊंगा
परेशान हैं, बेटियां परेशान हैं
कहते हैं - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
सो ये मेरा प्यारा हिन्द
आज भी ग़ुलाम है

संभल जाओ देशवासियों
बनवाओ एक क़ानून
जिसमे हो अधिकार एक नारी को
उसकी रक्षा का, उसकी आजीवन सुरक्षा का
तो बंद होगा ये अत्याचार
इन भगिनियों, पुत्रियों और माताओं पर

नम्र ये निवेदन करता हूँ मैं
मौत से लड़ सकता हु मैं
आहुति शरीर की भी दे सकता हूँ मैं
क्यूंकि मैं हूँ भक्त
मान दुर्गा का, यज्ञ भगवा न का
मैं पुजारी हूँ अमन का, गुरु का, शांति का
और शिव भगवान का
मैं मुर्ख था, मुर्ख हूँ पर
क़ानून बनना श्योर  हैं
क्यूंकि दिल हमारा प्योर है
कविता में भी ज़ोर है
और आज जनता में शोर है

मैं मुर्ख हूँ पर दिल से मैं अपूर्व  हूँ
दे श मांगता उत्कर्ष है
और मांगता युवराज है
क्यूंकि अब भी ये देवों का अंग देवांग है
ये टैगोर की गीतांजलि है
ये चारू  चन्द्र की चित्रावली है
ये श्रुतियों की खान है
रहती स्मृति परेशान है

नैना देवी हमारी जान है
अनुकृति की ये आकृति है
हृदयों का ये अंश है
चल रहा यहाँ आर्यों का ही वंश है

हमें देश से अनुराग हो
हर प्राणी यहाँ योगेश हो
हर भाल पर यहाँ चन्द्र हो
जनता जनार्दन का ही मन्त्र हो
सब लोगों में सदाचार हो
और अनुभव देश का आधार हो

जेलों में हमारे देश की धरोहर हैं
नहीं केवल पाप करने वाले सभी बंदी हैं
तू तो झूठे विवाद में फँस गया ऐ दोस्त
वरना क़ानून तो अभी अंध हैं
करना व्यभिचार, पाप, झूठ व दुराचार बंद है
तो सत्यनिष्ठ, सदाचारी , कर्तव्यवादी संविधान हो
पुलिस थाने की कार्यवाही भी निष्पाॅप हो।


(स्वरचित )
अनुभव शर्मा आर्य 'भवानन्द आर्य'

Sunday, September 28, 2014

माँ दुर्गे

ॐ 
माँ तेरे हाथ में शंख ये क्यूँ है?
तू चाहती है कि वेद ध्वनि हो मेरे राष्ट्र में।
माँ तेरे हाथ में चक्र ये क्यूँ है?
तू चाहती है कि एक संस्कृति हो मेरे राष्ट्र में।
माँ तेरे हाथ में पद्म ये क्यूँ है?
तू चाहती है कि शिष्टाचार हो मेरे राष्ट्र में।
और चाहती है कि सदाचार हो मेरे राष्ट्र में।
माँ तेरे हाथ में गदा ये क्यूँ है?
तू चाहती है कि दंड विधान हो मेरे राष्ट्र में।
माँ तेरे हाथ में धनुष ये क्यूँ है वाण ये क्यूँ है।
तू चाहती है कि यन्त्र हों वैज्ञानिकों के यहाँ पर मेरे राष्ट्र में।
माँ तेरे हाथ में त्रिशूल ये क्यूँ है?
तू चाहती है कि त्रिविध ताप से बचने के प्रयास हों इस मेरे राष्ट्र में।
और चाहती है कि सब के सब सुखी हो जाएँ मेरे राष्ट्र में।
माँ तेरे हाथ में खड्क ये क्यूँ है?
माँ तेरे हाथ में तलवार ये दुधारी क्यूँ है?
तू चाहती है कि प्रगति हो भौतिक यंत्रों की मेरे राष्ट्र में।
पर चाहती है की भूल न जाएँ आध्यात्मिकता को भक्त सभी।
तू चाहती है कि दो धारें हों इस मेरे राष्ट्र में
और ये धारें हैं भौतिक व आध्यात्मिक वाद की, तो दोनों हों।
क्यूंकि एक धार से तलवार बन नहीं सकती, भक्त मेरे।
माँ तेरा ये प्रथम हाथ यूँ खाली क्यूँ है?
तुझे आशीर्वाद देती हूँ भक्त मेरे।
और कहती हूँ तुझ जैसा प्रिय कोई और नहीं।
ये ज्ञान कहाँ से ले आया ऐ भक्त मेरे
बताना तू इसे नहीं किसी को भी ऐ पुत्र मेरे।







(स्वरचित)
आपका अपना 
भवानन्द आर्य 'अनुभव शर्मा आर्य'

Saturday, June 14, 2014

भर दे गोद को हमरी

प्रभु जी हम आये हैं इस तेरे संसार में।
तू भर दे गोद को हमरी अपने गिफ्टों के दान से।
तू है बहुत बड़ा दानी हम भी मांगें तुझसे।
देदे हम को वो सब कुछ जो कुछ चाहें हम तुझ से।
सुना है प्रभु तू ही दिलाता है सब कुछ इस संसार में।
पर हमको मांगना है पड़ता जो भी अपनी हो अरदास।
इसलिए सुन लो विनती ए भगवन हम।
हैं इस जग में अनाथ प्रभु मांगें तेरा हाथ।
मैं तो मांग चुका हूँ तुझसे अब तो पूरी कर दो आस।
सुना है तू करता है भक्त अपनों की हर पल पूरी आस।
तू देदे हमको अपनी दया का दान।
और देदे हम को तू अपनी भक्ति की भी आस।
देदे हमको संसारी गिफ्ट्स जो हम चाहें नाथ।
भर दे झोली भक्त अपने की कर दे पूरी आस।



आपका
अनुभव शर्मा

Saturday, May 17, 2014

इस नरक से खुदा बचाए

किसी को जानबूझ कर चाहने से नहीं होती।
मोहब्बत खरीदने से भी नहीं मिलती।
ये तो तब रंग दिखाती है जब नसीब जागा हो ।
और मिल कर फिर जुदाई कभी नहीं होती।


लेकिन अगले जन्मों में दुःख का हेतु है।
ये मोहब्बत ग़म का सागर है।
ये अब चिंता का कारण है।
इसलिए बचे रहो इससे ऐ दोस्त।
क्यूंकि ये वो शै है जो मौत का पैग़ाम देती है।


मुझे याद है वो जन्म।
जब मैं इस फेरे में पड़ा था।
अपना ही यार जब और के साथ हो।
तो क्या गुज़रेगी तुम पर।
शिट इस नरक से खुदा बचाए ।




आपका
अनुभव शर्मा 'भवानन्द'