Saturday, May 17, 2014

इस नरक से खुदा बचाए

किसी को जानबूझ कर चाहने से नहीं होती।
मोहब्बत खरीदने से भी नहीं मिलती।
ये तो तब रंग दिखाती है जब नसीब जागा हो ।
और मिल कर फिर जुदाई कभी नहीं होती।


लेकिन अगले जन्मों में दुःख का हेतु है।
ये मोहब्बत ग़म का सागर है।
ये अब चिंता का कारण है।
इसलिए बचे रहो इससे ऐ दोस्त।
क्यूंकि ये वो शै है जो मौत का पैग़ाम देती है।


मुझे याद है वो जन्म।
जब मैं इस फेरे में पड़ा था।
अपना ही यार जब और के साथ हो।
तो क्या गुज़रेगी तुम पर।
शिट इस नरक से खुदा बचाए ।




आपका
अनुभव शर्मा 'भवानन्द'

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