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Tuesday, January 22, 2019

आत्मा को अपनी ऐसे सजा


भाइयों बहनों अगर आपको सच्चा मनुष्य बनना है तो ईश्वर ने वेद में बताया है -
 

जीवन को अपने ऐसे सजा जिससे उजाला पूर्ण हो।
मन को तू अपने ऐसे सजा जिससे मधुरता पूर्ण हो ।
तन को तू अपने ऐसे सजा जिससे भरा बल पूर्ण हों ।
बुद्धि को अपनी ऐसे सजा जो ज्ञान से भरपूर हो ।
इन्द्रियों को अपनी ऐसे सजा  जिससे सदा दुःख दूर हो।
प्राणों को अपने ऐसे सजा मृत्यु भी  जिससे दूर हो।
सत्यानंद योगाभ्यास से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
सत्यानंद सत्य से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
सत्यानंद ओ३म् से सजा जिससे सदा आनन्द हो।
आत्मा को अपनी ऐसे सजा जिससे तुम्हारा मोक्ष हो॥

और ये तभी हो सकता है-

श्वांस श्वांस पर ॐ भज वृथा श्वांस मत खोवे। 
न जाने ये स्वांस भी आये या ना आवन होवे।
परमात्मा हर जगह मौजूद है पर नजर आता नहीं।
योग साधन के बिना कोई उसे पाता नहीं।
रात के चौथे प्रहरों में एक दौलत लुटती रहती है।
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है सो खोवत है।
उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन  कहाँ जो सोवत है।
प्रभु जागत है तू सोवत है।



आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Monday, June 11, 2018

भला होगा किसी बेआसरे को आसरा देना

भला होगा किसी बेआसरे को आसरा देना।
मुसीबत में किसी मजबूर की बिगड़ी बना देना।

अगर प्यारे तू ये चाहे कि जग में नाम हो जाए।
परायी आग में पड़कर खुदी अपनी जला देना।

तुम्हारे सामने गर हो तड़पता प्यास का मारा।
उसे दो घूंट पानी के दया कर के पिला देना।

करो कुछ काम नेकी के मचाना शोर न हरगिज़।
मगर उसको हमेशा के लिए दिल से भुला देना।

तेरे वीरान जीवन को प्रभु फूलों से भर देगा।
किसी रोते हुए दिल को ज़रा तुम भी हंसा देना।

बहारों में तो हँसते चमन के फूल सब लेकिन।
हो जब हीशान रखता हैं ख़िज़ाँ में मुस्कुरा देना।

तेरे पीछे जो आते हैं किसी को न लगे ठोकर।
मिले पत्थर जो रस्ते में पथिक उसको हटा देना।


(पथिक भजन)

प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा


Monday, April 23, 2018

ॐ महिमा

अथ ॐ महिमा 

ॐ नाम अनमोल है अमृत का भण्डार धार हृदय में नाम यह होगा बेड़ा पार। 
ॐ नाम अक्षर अविनाशी घट घट व्यापक आनन्द नाशी  सर्व दुःखों का औषध नाम। ॐ नाम जप सुबहो शाम। ॐ नाम आनंद प्रदाता बन्धु सखा भ्राता पितु माता। सच्चा मित्र है केवल नाम ॐ नाम मुक्ति का धाम। 

ॐ नाम सबसे बड़ा इससे बड़ा न कोई जो इसका सुमिरन करे शुद्ध आत्मा होई। 
ॐ नाम हृदय में धार इसकी महिमा अपरम्पार। रिद्धि सिद्धि का दाता ॐ  सिद्ध विनाशक त्राता ॐ। 
इसमें त्राटक खूब लगाओ मनवांछित फल आनंद पाओ।  अंतर्ज्ञान की ज्योति जगाओ पाप ताप संताप मिटाओ। 

ॐ नाम अमृत भरा सर्व सुखों की खान सबसे उत्तम नाम यह करते  वेद बखान। 
वेदों ने है ॐ बखाना शास्त्रों ने इसको है माना। दर्शन शास्त्र करें व्याख्यान ॐ नाम अमृत का खान। 
ॐ की महिमा गाती गीता भक्तों को जो करे पुनीता। ब्राह्मण ग्रंथों का यह सार ॐ नाम की महिमा अपार। 

ॐ नाम में है भरा सब नामों का सार ॐ नाम सृष्टि में हुआ प्रथम विस्तार। 
ब्रह्मा विष्णु और महेश गुणवाचक हैं नाम गणेश। शम्भू शिव शंकर भगवान नाम सभी ईश्वर के जान। 
क्रिया शक्ति व विश्व महान अ  अक्षर के हैं व्याख्यान।  उ अक्षर की महिमा अनंत वायु विरत जगती जड़ पंथ।
म की महिमा कौन बखाने ईश्वर आदित्य प्राज्ञ ही जाने।

ॐ नाम अक्षर बना अ उ म का योग।  इसके शुभ  संयोग से नष्ट भ्रष्ट हों रोग।
महिमा ऋषि मुनियों ने पायी सिद्ध जनों ने मुक्ति पायी।  अन्तर्मुख होकर जब ध्याया ॐ नाम रस अमृत पाया।
अर्थ विचार करे जो जाप उसके नाशे  तीनों ताप।  ॐ नाम में मन जो लगावे चार पदारथ सो जन पावे।

ॐ नाम सुमिरो सदा त्रिकुटी में कर ध्यान ॐ नाम के ध्यान से सिद्ध समाधि ज्ञान।
ध्यान ज्ञान का साधक ॐ  कष्टों का बाधक   है ॐ।  दुरितों  का है भक्षक  ॐ सिद्ध विनाशक रक्षक ॐ।
ॐ नाम की महिमा अभारी ॐ नाम है अति सुखकारी अनुभव सिद्ध ॐ का नाम जिसमें मन पावे विश्राम।

ॐ नाम के धनुष से कर आत्म संधान ब्रह्म लोक को बेधकर हो जा अंतर्ध्यान।
अंतर ज्योति ज्योत जगे जब मन में जब मन में।  जगमग ज्योति जगे जीवन में जीवन में।
ज्योतिर्मय है ॐ प्रकाश करता पाप ताप का नाश। इसमें योगी ध्यान रमाते  और इससे है परम मति पाते।
अमृत ज्योत बहे जब भीतर चंचल चित्त हो वश में ही कर। शोधन वोधन सब हो पावे ॐ नाम जब सहज समावे।

ॐ नाम के जाप का कर प्रतिदिन अभ्यास। भक्ति भाव शुभ भावना रख करके विश्वास।
एक तत्व में ध्यान रमाना निश्चय ईश कृपा है पाना। ईश कृपा है अति अनूप मुद मंगलमय आनंद रूप।
जो मन ईश कृपा को पावे सब जग उसको शीश झुकावे। बाल न बांका हो उस जन का जो स्वामी हो अपने मन का।

ॐ नाम बल तेज को अपने मन में धार। गायत्री का जाप कर जो वेदों का सार।
वेद सार गायत्री है ॐ  उसीका सार ॐ नाम के जाप से मिले मोक्ष का द्वार।
ॐ नाम गायत्री का सार इस के जप से बेड़ा पार। ॐ नाम की शोभा न्यारी भक्त जनों को लगती प्यारी।
जप से दूर न हरगिज़ रहना।  अपना सुख दुःख उससे कहना।

ॐ नाम से सींच कर अपना आप सुधार। आप सुधर कर और का होगा कुछ उपकार।
पर उपकार हृदय में लाना ॐ नाम जप न बिसराना।  सेवा संयम की हो टेक ॐ नाम अंतर में एक।
एक इष्ट की पूजा सुखकर एक देव हो ॐ कृतोस्मर।  एक देव केवल भगवान् ॐ नाम जिसका आस्थान

वेद शास्त्र मिलकर कहें अक्षर ॐ अनूप जिसकी छाया में रहें राजा रंक और भूप।
ॐ कृपा जब ही हो जावे छलना रस्ता झर झर जावे। भव भय बंध करें सब दूर आनंद से कर दे भरपूर।
परमानंद का बोध करावे सुख शान्ति हृदय में लावे। सात्विक भाव का उदय विकास यश और तप का होवे नाश।

ॐ नाम अमृत भरा अतिशय मंगल मूल।  ॐ नाम के जाप से मिटे हृदय के शूल।
ॐ नाम भक्तों का प्यारा, संत जनों को तारन हारा। प्रेम प्रताप बढ़ावे ॐ जगमग ज्योति जगावे ॐ।
ॐ नाम से ज्ञान समाने, ॐ नाम मन चित्त को शोधे। घंटे बजे बजे घड़ियाल ॐ नाम धुन हो तत्काल।

बिन बाजा झंकार हो बिन चंदा उजियार।  ॐ नाम के स्रोत की बरसे अमृत धार।
आनंद वर्षा तब हो पावे ॐ नाम से चित्त लगावे।  रुखा सूखा हो सब दूर ॐ नाम रस से भरपूर।
तृषा बुझे चिंता नहीं आवे जिनसे जब चित्त में छा जावे। तमस मिटे आशा व समता ॐ नाम में मन जब रमता।

ॐ नाम के ध्यान से मन नम हो तत्काल। शुद्ध चेतना ज्ञान से कटे कष्ट विकराल।
ॐ द्वारे काजरकारे घट घट जापे खारे खारे  जब हो वर्शन दर्शन  रुखा अमृत बरसे मधुर सोम का।
पावन हीरा मस्त हो  पावे जीवन हीरा मस्त हो जावे।  दर्शक भी पावे आनंद ॐ नाम है करुणापन्न।
ॐ नाम में सुरति दिखाना कभी भी उसको न बिसराना।

ईश कृपा बरसे जहाँ होवे परमानंद।   परमानंद के योग से मिटे सकल दुःख द्वन्द।
परमानंद पावे जब प्राणी अन्तर्मुख हो जावे वाणी। क्रिया कलाप सकल हो बंद ॐ नाम गूंजे आनंद।
रसना ॐ नाम रस पीवे पी पी कर पापों को धोवे। सुख शांति आनंद का स्रोत ॐ नाम की निर्मल ज्योत।

ॐ नाम की ज्योति से मिटे सकल अज्ञान।  ज्ञान प्रकाशे चित्त में विकसे निर्मल ज्ञान।
ज्ञान बिना जीवन निस्सार ज्ञान बिना  ना कटे अतिहार ज्ञान बिना नीरस सब ग्रन्थ ज्ञान बिना सूझे नहीं पंथ।
ज्ञान बिना बंधन नहीं टूटे ज्ञान बिना साधन सब झूंटे।  ॐ नाम से ज्ञान प्रकाशे ॐ नाम से संकट नाशे।

ॐ नाम प्रगटे जहां सुख सिद्धि का सार।  ॐ नाम के जाप के सुधरें बिगड़े काज।
ॐ नाम महिमा अति भारी जो है अतिशय मंगलकारी। ॐ नाम की पूजा अर्चा ॐ नाम की सुन्दर चर्चा।
ॐ नाम जो रसना गावे तीनों ताप को दूर भगावे।  सबसे दूर हो ३२ पाप जगमग जगमग ज्योति विकास।

ॐ नाम आदित्य है सबसे है अति दूर।  जो उसको उर धार ले जीवन हो भरपूर।
चंचल चित्त जब मन भटकावे चिंता चिता नज़र सब  आवे चिंतन ॐ नाम का करना।
चित्त चंचल से कभी न डरना।  नाम अभ्यास से वश में करना वैरागी बन  धीरज धरना।

दीर्घ प्रणव अभ्यास से चंचल चित्त रुक जाए। अन्तर्मुख हो ध्यान में प्रभु शरण चित्त लाये।
देवों की एक अनुपम नगरी अष्ट चक्र नव द्वारों जकड़ी उसमें एक हिरण्मय कोष सरहित ज्योति से आहोश
ॐ नाम उसमें समावे चेतन भाव तभी जग जावे। जड़ता मिटे अविद्या नाशे जीवन ज्योति हृदय प्रकाशे।

ॐ नाम के नाद उठे मृदुल झंकार जो इसको उर धार ले उसका बेडा पार।
श्रवण मनन करके  निदिध्यासन   निदिध्यासन से निश्चल आसन।  आसन सिद्धि जब हो जावे रिद्धि सिद्धि सब भागी आवे।
चंचल मन पावे विश्राम जब निकले मुख से प्रभु नाम। जो इस नाम में चित्त लगावे जीवन मुक्त हो मुक्ति पावे।

मुक्ति मिले उस भक्त को जिसका शुद्ध आचार सेवा संयम सरलता सत्संग परउपकार।
परउपकार को जो अपनावे जीवन मुक्ति सो जन पावे। पर पीड़ा जो सहे  निरंतर उसका शुद्ध और निर्मल अंतर।
निर्मल मन उद्धार को चाहवे निर्मल मन वांछित फल पावे। निर्मल मन से कटे प्रभात उस जन का हो बेडा पार।

निर्मल मन में प्रगटे ज्योति उत्तम ज्ञान निर्मल मन में उपजे सकल ज्ञान विज्ञान।

ॐ नाम से निर्मल ज्ञान।  ॐ नाम सबसे प्रधान। ॐ नाम निज नाम प्रभु का।
ॐ नाम है प्रेम प्रभु का। ॐ नाम उपमा नहीं पावे। ॐ नाम जो भी जन गावे।
ॐ नाम जपना नित आप। ॐ नाम हरे तीनों ताप। ॐ नाम हरे तीनों ताप।



(श्रीमत दयानन्द विश्वविद्यालय  गुरुकुल चोटीपुरा की ब्रह्मचारिणियों के गाये भजन से। )

प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Wednesday, April 18, 2018

एक योगेश्वर कृष्ण दूसरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम।


बनकर सूरज चाँद गगन में चमक रहे दो प्यारे नाम।
एक योगेश्वर कृष्ण दूसरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम।

राम ने सेवा सत्य वचन और निर्भयता को धारा।
मानव की हर मर्यादा ने अपना रूप निखारा।
जिनको निज आदर्श मानकर गुण गावे संसार तमाम।
एक योगेश्वर कृष्ण दूसरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम।


मात पिता की आज्ञा पाकर राम ने संकट झेले।
चौदह वर्ष वनो में रहकर हर मुश्किल से झेले।
त्याग तपस्या ब्रह्मचर्य से जीत लिए कितने संग्राम।
एक योगेश्वर कृष्ण दूसरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम।




जीवन में महाराज कृष्ण ने अद्भुत बल दिखलाया।
दुष्ट जनों का इस धरती से नाम ओ निशान मिटाया।
मानवता  खिल उठी दिया जब गीता का पावन पैग़ाम।
एक योगेश्वर कृष्ण दूसरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम।

नहीं मिला इतिहास कहीं पर कृष्ण सुदामा जैसा।
निर्धन और धनवान में जब दीवार बना नहीं पैसा।
भारत विश्व गुरु कहलाया हुए पथिक सुन्दर पैग़ाम।


प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Tuesday, April 10, 2018

कण्टक पथ अपनाना सीखें



कण्टक पथ अपनाना सीखें।
जियें देश के लिए देश हित तिल तिल कर मर जाना सीखें। 

राग रंग की नव तरंग में माँ की याद भुलाते आए।
भूल गए अपने वैभव को यश गौरव का गाते  आए।
अति माना का व्रत अपना कर बून्द बून्द ढल जाना सीखें। 

बढ़े चलें निज ध्येय बिंदु पथ जग का सुख ऐश्वर्य भुला कर।
दूर करें मन का अंधियारा निज जीवन का दीप जला कर। 
अडिग रहे जो झंझा में भी ऐसी ज्योति जगाना सीखें।
 
अपमानों की याद जगाकर सुनें करुण माता का क्रंदन।
कोटि कोटि कंठों से  गूंजे आज पुनः कल अंतर्दर्शन। 
जननी के पावन चरणों में जीवन पुष्प चढ़कर।

Monday, March 26, 2018

मेरी नैय्या है तेरे हवाले

डूबतों को बचा लेने वाले मेरी नैय्या है तेरे हवाले। 

लाख अपनों को मैंने पुकारा सब के सब कर गए हैं किनारा। 
और कोई न देता दिखाई सिर्फ़ तेरा ही अब तो सहारा। 
कौन तुझ बिन भंवर से निकाले। मेरी नैय्या है तेरे हवाले। 

जिस समय तू बचाने पे आवे आग में भी बचा कर दिखावे। 
जिस पर तेरी दया दृष्टि होवे कैसे उस पे कहीं आंच आवे। 
अँधियों में भी तू ही संभाले। मेरी नैय्या है तेरे हवाले। 

पृथ्वी सागर व पर्वत बनाये तूने धरती पे दरिया बहाये। 
चाँद सूरज करोंड़ों सितारे फूल आकाश में भी खिलाये। 
तेरे सब काम जग से निराले। मेरी नैय्या है तेरे हवाले। 

बिन तेरे चैन मिलता नहीं है फूल आशा का खिलता नहीं है। 
तेरी मर्ज़ी बिना तो जहाँ में पथिक पत्ता भी हिलता नहीं है। 
तेरे बस में अँधेरे उजाले। मेरी नैय्या है तेरे हवाले। 


प्रस्तुति 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

Thursday, March 15, 2018

हे ज्ञानवान भगवन

हे ज्ञानवान भगवन हमको भी ज्ञान दे दो।

करुणा के चार छींटे करुणानिधान दे दो।
हे ज्ञानवान भगवन हमको भी ज्ञान दे दो।

(सुलझा सकें हम अपने जीवन की उलझनों को)-2 । जीवन की उलझनों को।
प्रज्ञा ऋतम्भरा से बुद्धि का दान दे दो।

अपनी मदद हमेशा खुद आप कर सकें हम।  खुद आप कर सकें हम।
इन बाज़ुओं में शक्ति हे शक्तिमान दे दो। 

उपकार भावना से निर्भीक सत्य वाणी। निर्भीक सत्य वाणी। 
मीठे ही शब्द बोलें  ऐसी ज़बान दे दो। 

दाता तुम्हारे घर में किस चीज़ की कमी है। किस चीज़ की कमी है। 
चाहो तो निर्धनों को दौलत की खान दे दो। 

तुम देवता हो सबकी बिगड़ी बनाने वाले। बिगड़ी बनाने वाले। 
जीवन सफल बने जो थोड़ा सा ध्यान दे दो। 

डर है पथिक तुम्हारा रस्ता ना भूल जाएँ। रस्ता ना भूल जाएँ। 
भक्तों की मंडली में हमको भी स्थान दे दो। 

प्रस्तुति 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

Saturday, March 3, 2018

यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से।

ऋषियों ने ऊँचा माना है स्थान यज्ञ का
भगवान का ये यज्ञ है भगवान यज्ञ के।
जाता है देवलोक में इन्सान  यज्ञ से
जल्दी प्रसन्न-------------------------


जो कुछ भी डालो यज्ञ में खाते हैं अग्नि देव
एक एक के बदले सौ सौ दिलाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के पानी भी बरसाते अग्नि देव
पैदा अनाज करते हैं भगवान यज्ञ से।

शक्ति व तेज यश भरा इस शुद्ध नाम में
पूजा है इसको कृष्ण ने भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसके ही सामने
मिलती है राज कीर्ति संतान यज्ञ से।

इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता
इसके पुजारी को कहीं भी भय नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न -----------------------

चाहे अमीर है चाहे कोई ग़रीब है
जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है
उपकारी मानव बनता है इस देव यज्ञ से
जल्दी प्रसन्न ------------------------

यूट्यूब पर सुनें - यज्ञ महिमा 

प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Monday, February 19, 2018

सारे अरमां पड़े के पड़े रह गए

डोली लेके पिया द्वार पर आ गए सारे अरमां पड़े के पड़े रह गए।
चार बतियाँ भी मैं उनसे कह ना सकी कहती तो तब मेरी जबान हिल ना सकी
मेरे मुंह में ताले पड़े के पड़े रह गए।

उनके आते ही पथरा गयीं पुतलियां रुक गईं दिल की धड़कन सभी नाड़ियां।
सारा संसार मानो अदृश्य हो गया मेरे नैना खुले के खुले रह गए।

मेरी फूलों से डोली सजाई गई उसपर अनोखी चदरिया उढ़ाई गयी।
टूटे रिश्ते नाते सभी प्यार के मोह ममता खड़े के खड़े रह गए।

खाली हाथ से संग में थी नेकी बड़ीमुझे महसूस होने लगी बेखुदी।
कपट स्वार्थ से जो भी दौलत कमाई वो ख़जाने पड़े के पड़े रह गए। 

मेरी चन्दन से सेज सजाई गयी उसपर दुल्हनिया सुलाई गयी।
लाख की ज़िन्दगी ख़ाक में मिल गयी और कुनबे खड़े के खड़े रह गए।

श्री जगराम सिंह ग्राम इस्माईलपुर, सेवा निवृत्त कर्मचारी (UPSRT निगम )
फ़ोन - 9457095285 


द्वारा
-ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

कैसे मनाऊं

मैं कैसे मनाऊं मेरे रूठे सँवरिया।

युवापन की मैली चदरिया विषयन दाग पड़ाई।
बिन धोये पिया रीझत नाहीं सेज से देत गिरायी।
सुमरन ध्यान का साबुन कर ले सत्य बात दरसाई।
पांच रुपये में घेर लई पाँच तत्व से भरी चुनरिया।

ये चुनरिया मेरे मायके\से आयी साथ दहेज़ में तीन गठरी भी लायी।
इस पर भी पिया खुश न हुए खोल दई सारी गठरिया।

सारा जग मैंने ढूंढ लिया।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों से पूछ लिया हार गयी और थक भी गयी।
तब मैं गुरु की शरण गई शरणागत ने मुझे बताया।
तेरे सँवरिया यहीं छिपे हैं, खोल ले अपनी दाग़ चुनरिया।

मेरी चुनरिया है नश्वर मृत्यु का ढेर है बिना ईश्वर।
इड़ा पिङ्गला सुषुम्ना श्रुति व निरुक्ति से जान लिया।
ॐ सोऽहं सब झंकार रहे अनहत बाजे बाज रहे।
अब तुम्हीं बताओ कहाँ छिपे हो मेरे सँवरिया।



श्री जगराम सिंह ग्राम इस्माईलपुर, सेवा निवृत्त कर्मचारी (UPSRT निगम )
फ़ोन - 9457095285 


द्वारा
-ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

ध्यान मार्ग

मेरे दिल की है ये आवाज़ कि मेरा बिछड़ा रूप मिलेगा।
आज नहीं तो कल मेरा सृजनहार मिलेगा।
सृजनहार मेरा बहुरंगी है चाल उसकी सतरंगी है।
इस चाल में बह कर के मुझे उसका दीदार मिलेगा।


अलख नाम एक ओंकारा है विश्व भू रचा जग सारा है।
काया कोट में रम रहा प्यारा शीशमहल में डेरा है।
शीशमहल में स्वामी दर से जहाँ प्रेम अमीरस बरसे।
निस दिन हरि का सुमिरन कीजे कह गए दास अमीरस पीजे।
शीश महल के दस दरवाज़े कौन दरवाज़े से मेरा दिलदार मिलेगा।



तुम्हारा रूप रेख कुछ नाहीं अजपा रूप मन भाया।
ह्रदय कमल में ज्योति तुम्हारी अनहत नाद वेद दरसाया।
ॐ सोऽहं के मध्य में रहते अँधा जगत देख नहीं पाया।
इड़ा पिङ्गला सुषुम्ना श्रुति निरुक्ति से राह लखाया।
सहज शून्य में वास तुम्हारा घट पिंड में ब्रह्माण्ड तुम्हारा।
ॐ सोऽहं के मध्य में तेरा एक नूर मिलेगा।

हृदय आकाश में आप विराजा रची सृष्टि प्रजा और राजा।
अगम अगोचर प्रभु सब ठाई सूक्ष्म नेत्र से देह दिखाई।
क्या पढ़ना क्या गुनना कीजे समझ बूझ ध्यान नित दीजे।
क्या वेद पुरान लखाना शुन्य शिखर पर देओ ध्याना।
ध्यान मार्ग पर चल करके मुझे अपना ही रूप मिलेगा।


श्री जगराम सिंह ग्राम इस्माईलपुर, सेवा निवृत्त कर्मचारी (UPSRT निगम )
फ़ोन - 9457095285 


द्वारा
-ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Friday, February 16, 2018

यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां

ॐ अग्निमीडे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारं रत्नधातमं। 


दीपक पर जलने का मज़ा ये दीपक के परवाने से पूछ।
और क्या मज़ा ईश्वर भक्ति में है ये ईश्वर के दीवाने से पूछ।
कौन कहता है कि मुलाक़ात नहीं होती है।
रोज़ मिलते हैं मगर कभी बात नहीं होती।

बंदा होके न बंदियां कमा यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां।
खोटे  कर्मों के पास न जा यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां।

हीरा सा जन्म तुझे जिस ने भी दिया है एक भी छदाम नहीं बदले में लिया है
कधी उसका भी शुकर  मना यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां।

धरती पे फूल भी खिलाये तेरे वास्ते मधुर मधुर फल लगाए तेरे वास्ते।
बीरा मुर्गी न मार मार खा यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां।

नीला नीला नीर भी बहाया तेरे वास्ते नभ को सितारों से सजाया तेरे वास्ते।
गन्दी नालियों में मत ना नहा यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां।


तान सुरीली तेरे कंठ में लगाई है कोयल सी आवाज़ तूने बेमोल पायी है।
गंदे गीत न बीर कभी गा यूँ ही व्यर्थ न उमर गवां।


(आर्यसमाज के भजनों से)

प्रस्तुति
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

Friday, December 22, 2017

जाग गए अब सोना क्या रे



जाग गए अब सोना क्या रे।  जाग गए अब सोना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।

जो नर तन देवन  को दुर्लभ सो पाया फिर रोना क्या अब।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।

हीरा हाथ अमोल सहाय। काँच भाव से खोना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।

जब वैराग्य ज्ञान घिर आया तब जाने और सोना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे।जाग गए अब सोना क्या रे।

गाये सुजन सुवन में घिर के।  भार सभी का ढोना  क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे।जाग गए अब सोना क्या रे।

ईशवर से कर नेह बावरे।  इन्द्रिय के वश होना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।

ॐ नाम का सुमिरन कर ले।  अंत समय में होना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।

जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।
जाग गए अब सोना क्या रे। जाग गए अब सोना क्या रे।

(महर्षि दयानन्द गुरुकुल, चोटीपुरा की ब्रह्मचारिणियों द्वारा गए भजनों से साभार )


आपका 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 

चल पड़े पहर जिस ओर पथिक

पा, सा  नी सा , सा  नी सा , सा  नी सा,  नी,  धा पा नी, नी धा  नी, नी धा नी, नी धा नी, धा, पा मा गा, धा  पा धा धा पा धा, धा पा धा, पा, मां गा, मा, पा सा नी सा 

चल पड़े पहर जिस ओर पथिक उस पथ पर फिर डरना कैसा। 
यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर..... 

हो कर चलने को उद्यत तुम न तोड़ सके बंधन घर के। 
सपने सुखमय भव के राही न छोड़ सके अपने उर के। 
जब शोलों पर ही चलना है पग फूंक फूंक रखना कैसा। 
ये रुक रुक कर बढ़ना कैसा। ये रुक रुक कर बढ़ना कैसा।
चल पड़े पहर जिस ओर पथिक उस पथ पर फिर डरना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर..... 


पहले ही तुम पहचान चुके ये पथ तो काँटों वाला है। 
पग पग पर पड़ी शिलायें हैं कंकड़मय काँटों वाला है। 
दुर्गम पथ अँधियारा छाया फिर मखमल का सपना कैसा।
यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर पथिक उस पथ पर फिर डरना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर..... 

होता है प्रेम फ़क़ीरी से इस पथ पर चलने वालों को। 
पथ पर बिछ जाना पड़ता है इस पथ पर बढ़ने वालों को। 
यह राह भिखारी बनने की सुख वैभव का सपना कैसा। 
यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर पथिक उस पथ पर फिर डरना कैसा।  
चल पड़े पहर जिस ओर..... 

इस पथ पर बढ़ने वालों को बढ़ना ही  है जीवन आता। 
आती जो पग में बाधाएं  उन से बस लड़ना ही आता। 
तुम भी जब चलते उस पथ पर फिर रुकना और झुकना कैसा। 
यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। यह रुक रुक कर बढ़ना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर पथिक उस पथ पर फिर डरना कैसा। 
चल पड़े पहर जिस ओर..... चल पड़े पहर जिस ओर.....चल पड़े पहर जिस ओर.....

(महर्षि दयानन्द गुरुकुल, चोटीपुरा की ब्रह्मचारिणियों द्वारा गए भजनों से साभार )

आपका 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा 


Tuesday, November 21, 2017

सुखी कोई परिवार नहीं।

परमपिता से प्यार नहीं और शुद्ध रहे व्यवहार नहीं।
इसीलिए तो आज देखलो सुखी कोई परिवार नहीं।
परमपिता से प्यार नहीं -------------------।।

अन्न, फूल, फल, मेवाओं को समय समय पर देता।
लेकिन है आश्चर्य यहीं कि बदले में कुछ नहीं लेता।
करता है इंकार नहीं, भेदभाव तक़रार नहीं।
परमपिता से प्यार नहीं -------------------।।


मानव चोले में न जाने कितने यन्त्र लगाये हैं।
क़ीमत कोई माप सका न, ऐसे अमूल्य बनाये हैं।
कोई अंग बेकार नहीं, पा सकता कोई पार नहीं।
ऐसे कारीगर का बन्दे करता ज़रा विचार नहीं।
परमपिता से प्यार नहीं -------------------।।


जल, वायु और अग्नि का वो लेता नहीं किराया है।
सर्दी, गर्मी, ऋतु बसन्त का सुन्दर चक्र चलाया है।
लगा कहीं दरबार नहीं, कोई सिपा सालार नहीं।
कर्मों का फल देता बराबर रिश्वत की सरकार नहीं।
परमपिता से प्यार नहीं -------------------।।


सूर्य, चाँद, तारों का न जाने, कहाँ बिजलीघर बना हुआ।
पल भर को धोखा नहीं देते कहाँ पे तार जुड़ा हुआ।
खम्भा है न कोई तार नहीं, खड़ी कोई दीवार नहीं।
ऐसे शिल्प कार  का रे तू बन्दे, करता ज़रा विचार नहीं।

(भजन ९९, भक्ति गीतांजलि, आचार्य बालकृष्ण जी, दिव्य प्रकाशन )


प्रस्तुत कर्ता
अनुभव शर्मा

(भजन ९९, भक्ति गीतांजलि, आचार्य बालकृष्ण जी, दिव्य प्रकाशन )

Monday, November 20, 2017

राम चंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आयेगा

हे जी रे हे जी रे हे जी रे 

राम चंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आयेगा हंस चुगेगा दाना गुनका कव्वा मोती खायेगा। हे जी रे हे जी रे। 

सिया ने पूछा, "भगवन कलियुग में धर्म करम को कोई नहीं मानेगा?",  तो प्रभु बोले-

धरम भी होगा करम भी होगा, परन्तु शर्म नहीं होगी, बात बात में मात पिता को बेटा आँख दिखायेगा। हे राम चंद्र कह गए सिया से। 

राजा और प्रजा दोनों में होगी निसिदिन खींचा तानी, खींचा तानी, क़दम क़दम पर करेंगे दोनों अपनी अपनी मनमानी, मनमानी, जिस के हाथ में होगी लाठी, भैंस वहीँ ले जायेगा। 
हंस चुगेगा दाना गुनका कव्वा मोती खायेगा। हे राम चंद्र कह गए सिया से। 

सुनो सिया कलजुग में काला धन और काले मन होंगे, काले मन होंगे। चोर उचक्के नगर सेठ, और प्रभु भक्त निर्धन होंगे, निर्धन होंगे।  जो होगा लोभी  और भोगी वो जोगी कहलायेगा। हंस चुगेगा दाना गुनका कव्वा मोती खायेगा। हे राम चंद्र कह गए सिया से। 


मंदिर सूना सूना होगा भरी रहेंगी मधुशाला, मधुशाला।  पिता के संग संग  भरी सभा में नाचेगी घर की बाला, घर की बाला।  कैसा कन्या दान पिता ही कन्या का धन खायेगा। हंस चुगेगा दाना गुनका कव्वा मोती खायेगा। हे राम चंद्र कह गए सिया से। 

हे मूरख की प्रीत बुरी जुए की जीत  बुरी,बुरे संग बैठ चैन भागे ही भागे। काजल की कोठरी में कैसा ही जतन करो काजल का दाग भाई लागे ही लागे, काजल का दाग भाई लागे ही लगे। 

हे कितना जती हो कोई कितना सती हो कोई कामिनी के संग काम जागे ही जागे। हो सुनो कहे गोपीराम जिसका है काम नाम उसका तो फंद गले लागे ही लागे रे भाई उसका तो फंद गले लागे ही लागे। 


प्रस्तुत कर्त्ता -

आपका अपना 
अनुभव शर्मा 

Friday, November 17, 2017

जैसे सूरज की गर्मी से

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाये तरुवर की छाया। 
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया मेरे राम। 


भटका हुआ मेरा मन था कोई मिल न रहा था सहारा। 
लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे, मिल न रहा हो किनारा। 
उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया। 
ऐसा ही सुख मेरे मन को ----------------------------------


शीतल बने आग चन्दन के जैसी राघव कृपा हो जो तेरी। 
उजियाली पूनम की बन जाएँ रातें जो थीं अमावस अँधेरी। 
युग युग से प्यासी मारभूमि ने, जैसे सावन का सन्देश पाया। 
ऐसा ही सुख मेरे मन को ----------------------------------


जिस राह की मंज़िल तेरा मिलान हो, उस पर क़दम मैं बढ़ाऊँ। 
फूलों में खारों में पतझड़ बहारों में  मैं न कभी डगमगाऊं। 
पानी के प्यासे को तक़दीर ने जैसे जी भर के अमृत पिलाया। 
ऐसा ही सुख मेरे मन को ----------------------------------



भजन  १२७ : भक्ति गीतांजलि, आचार्य बालकृष्ण जी, दिव्य प्रकाशन, हरिद्वार 


[नोट: 'रमेति रामः' - जो परमात्मा कण कण में बसा हुआ है उसे राम कहते हैं। और एक राम लगभग साढ़े आठ लाख वर्ष पूर्व हुए दशरथ नंदन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चंद्र जी।  जिन्होंने अपने जीवन में एक भी पाप नहीं किया अतः भगवान् राम के नाम से जाने जाते  हैं। ]

भजन जनम सफल होगा रे बन्दे

बोलो राम जय जय राम बोलो  राम। 
बोलो राम जय जय राम बोलो राम।टेक।


जनम सफल होगा रे बन्दे। मन में राम बसा ले। मन में राम बसा ले। 
राम नाम के मोती को सांसों की माला बना ले। मन में राम बसा ले। 

राम पतित पावन करुणाकर और सदा सुखदाता। 
सरस सुभावन अति मन भावन राम से प्रीत लगा ले। 
मन में राम बसा ले। 
बोलो राम जय जय राम बोलो राम। 


मोह माया झूंठा बंधन त्याग उसे ऐ प्राणी। 
बोलो राम जय जय राम बोलो राम। 
राम नाम की ज्योत जलाकर अपना भाग्य जगा ले। 
मन में राम बसा ले। 


राम भजन में डूब के अपनी निर्मल कर ले काया। 
राम भजन से प्रीत लगा के जीवन पार लगा ले। 
मन में राम बसा ले।  
बोलो राम जय जय राम बोलो राम। 
बोलो राम जय जय राम बोलो राम। 






[नोट: 'रमेति रामः' - जो परमात्मा कण कण में बसा हुआ है उसे राम कहते हैं। और एक राम लगभग साढ़े आठ लाख वर्ष पूर्व हुए दशरथ नंदन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चंद्र जी।  जिन्होंने अपने जीवन में एक भी पाप नहीं किया अतः भगवान् राम के नाम से जाने जाते  हैं। ]


प्रस्तुतकर्ता 

आपका 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा